मॉडर्न लव और लॉयल्टी टेस्ट ... अगर ‘कॉकटेल-2’, देखने का प्लान है तो पहले पढ़ें यह रिव्यू

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आपको वह मशहूर रियलिटी शो ‘इमोशनल अत्याचार’ याद है? वह आइकॉनिक शो, जिसमें शक करने वाले पार्टनर अपने रिश्तों को टीवी पर लाइव साबित करने के लिए कठिन ‘लॉयल्टी टेस्ट’ से गुजरते थे और आखिर में टीवी स्क्रीन पर हंगामा मच जाता था। ‘कॉकटेल 2’ बिल्कुल उसी शो का एक बेहद महंगा संस्करण लगती है। बस इस बार, इस लॉयल्टी टेस्ट में ए-लिस्ट स्टार्स, डिज़ाइनर कपड़े, सिसिली के खूबसूरत सूर्यास्त के नज़ारे, शानदार म्यूज़िक और बॉलीवुड का बड़ा बजट जोड़ दिया गया है।

क्या है फिल्म की कहानी?

फिल्म की कहानी शाहिद कपूर और रश्मिका मंदाना के एक स्थिर और मजबूत दिखने वाले रिश्ते के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसमें कृति सेनन के किरदार की एंट्री होते ही भूकंप आ जाता है। इसके बाद जो देखने को मिलता है, वह है आकर्षण, कमिटमेंट और आज के दौर के प्रेम (Modern Love) का एक चमकदार और ग्लैमरस प्रदर्शन। निर्देशक होमी अदजानिया हमें यही मानने पर मजबूर करना चाहते हैं कि यही आज का प्यार है। लेकिन, रिश्तों के अलग-अलग पहलुओं को दिखाने की कोशिश में ‘कॉकटेल 2’ दर्शकों को किरदारों से भावनात्मक रूप से जोड़ने में पूरी तरह असफल रहती है।

फिल्म में हमें बताया जाता है कि कुणाल और दिया (शाहिद और रश्मिका) पिछले 16 सालों से साथ हैं। वे एक-दूसरे के प्यार में इतने डूबे हुए हैं कि शादी को सिर्फ एक कानूनी कागज़ से ज्यादा कुछ नहीं मानते। लेकिन निर्देशक उनके रिश्ते की उस भावनात्मक नींव को दिखाने में बहुत कम समय बिताते हैं, जिसकी वजह से जब उनका रिश्ता टूटने लगता है तो दर्शकों को कोई खास फर्क नहीं पड़ता। दूसरी तरफ, अली (कृति सेनन) शुरुआत में कुणाल को आकर्षित करने के इरादे से आती है, लेकिन बाद में उससे प्यार करने लगती है। जिस रिश्ते की शुरुआत ही एक नाटक और दिखावे से हुई हो, उसकी सफलता के लिए दर्शक कैसे प्रार्थना कर सकते हैं?

आज के रिश्तों के अनसुलझे सवाल

फिल्म कुछ वाकई दिलचस्प सवाल जरूर उठाती है:

  • अगर आपको रिश्ता चाहिए लेकिन शादी नहीं, तो क्या?
  • जब रिश्तों में कम्फर्ट (सुकून) उबाऊ लगने लगे तो क्या होता है?
  • क्या सोशल मीडिया और डेटिंग ऐप्स ने हमें यह मानने पर मजबूर कर दिया है कि प्यार में हमेशा रोमांच होना ही चाहिए?
  • क्या आज के समय में लोग दिल टूटने से ज्यादा कमिटमेंट (वचनबद्धता) से डरते हैं?

ये सभी विषय चर्चा के योग्य हैं, लेकिन समस्या यह है कि ‘कॉकटेल 2’ आज के रिश्तों की भाषा (शब्दों) को तो समझती है, पर उनकी वास्तविकता को पकड़ नहीं पाती।

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2012 की ओरिजिनल ‘कॉकटेल’ के सामने फीकी

साल 2012 में आई ओरिजिनल फिल्म ‘कॉकटेल’ (सैफ, दीपिका और डायना पेंटी स्टारर), एक दशक से भी ज्यादा पहले रिलीज़ होने के बावजूद, प्यार, दोस्ती और दिल टूटने के दर्द को कहीं बेहतर तरीके से समझाती थी। उसमें दीपिका का ‘वेरोनिका’ वाला किरदार भले ही अप्रत्याशित और गलतियाँ करने वाला था, लेकिन वह असली लगता था। लोग समझते थे कि लोग उससे प्यार क्यों करते हैं, क्योंकि उसके पास दिल था। जबकि इस नई फिल्म में किरदारों के पास न दिल है, न दिमाग। हर किरदार अपनी भावनाओं के अनुसार नहीं, बल्कि स्क्रिप्ट की सुविधा के अनुसार काम करता हुआ दिखाई देता है।

रश्मिका और कृति के किरदारों में कमियां

फिल्म में सबसे बड़ा अन्याय रश्मिका मंदाना के साथ हुआ है। उनका किरदार सिर्फ एक ऐसी गर्लफ्रेंड तक सीमित रह गया है जो असुरक्षित, अतार्किक और डॉमिनेटिंग (हुक्म चलाने वाली) है। कृति के ग्लैमरस और बोल्ड किरदार के सामने रश्मिका को बिल्कुल साधारण (Plain Jane) दिखाया गया है। रश्मिका की हिंदी डायलॉग डिलीवरी में अभी भी सुधार की जरूरत है, लेकिन उनका किरदार जिस तरह कमजोर लिखा गया है, उसे देखकर उनके लिए दया आ जाती है।

दूसरी ओर, कृति सेनन को थोड़ा दिलचस्प किरदार मिला है। अली जानती है कि वह आकर्षक है और लोगों पर उसका क्या असर पड़ता है, और वह अपने इस आकर्षण का इस्तेमाल करने से हिचकती नहीं। लेकिन समस्या यह नहीं है कि वह आत्मविश्वास से भरी हुई है, समस्या यह है कि उसके किरदार को बेहद नकारात्मक (Extreme) बना दिया गया है। कुछ दृश्यों में अली बहुत स्वार्थी और टॉक्सिक (ज़हरीली) नजर आती है।

साल 2026 के इस आधुनिक दौर में दो सफल और आत्मनिर्भर महिलाएँ एक ही पुरुष के लिए इस तरह लड़ें, यह बिल्कुल अनुचित और अवास्तविक लगता है। लव ट्रायंगल (त्रिकोणीय प्रेम) हो सकता है, लेकिन फिल्म दर्शकों को यह बात स्वीकार कराने में असफल रहती है कि इस पुरुष में ऐसा क्या खास है, जिसके लिए पूरी जिंदगी के रिश्तों और दोस्ती को दांव पर लगा दिया जाए! फिल्म का संघर्ष पूरी तरह कृत्रिम लगता है, मानो स्क्रीनप्ले सिर्फ अराजकता पैदा करने के लिए लिखा गया हो।

शाहिद कपूर: फिल्म का एकमात्र प्लस पॉइंट

इस पूरी कहानी में हैरानी की बात यह है कि शाहिद कपूर का किरदार सबसे ज्यादा पसंद आने वाला है। वह आज के दौर का आदर्श पार्टनर (Green Flag) है। वह ऐसा पुरुष है जो अपनी गर्लफ्रेंड की बहनपनी के लिए कढ़ी-चावल बनाता है, भावनात्मक सुख को महत्व देता है और सच्चे दिल से मानता है कि प्यार का मतलब है हर सुबह उठकर अपने पार्टनर को फिर से चुनना।

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शायद यही फिल्म का सबसे खूबसूरत विचार है

रिश्तों में सुकून (comfort) होना उबाऊ नहीं है; समय के साथ रोमांच कम हो सकता है, लेकिन सच्चे रिश्ते रोजमर्रा की साधारण जिंदगी में ही बनते हैं।

आज के सोशल मीडिया और इंस्टाग्राम पर परफेक्ट दिखने के दौर में यह विचार उम्मीद देता है। लेकिन दुर्भाग्य से, यह समझ फिल्म में दो घंटे के मानसिक हंगामे के बाद बहुत देर से आती है।

कुल मिलाकर, ‘कॉकटेल 2’ उन मिलेनियल्स (युवाओं) के लिए गुस्सा दिलाने वाली फिल्म साबित होती है जो प्यार, कमिटमेंट और दोस्ती पर भरोसा करके बड़े हुए हैं। फिल्म रिश्तों को इतना नाजुक दिखाती है कि कोई तीसरा आकर्षक व्यक्ति कमरे में प्रवेश करे और रिश्ता टूट जाए। यह प्यार को सस्ता, व्यावसायिक और फेंक देने योग्य (Disposable) दिखाती है।

तकनीकी पक्ष और लुक

दिखने के लिहाज से फिल्म शानदार है। सिसिली के बेहद खूबसूरत लोकेशन पोस्टकार्ड जैसे लगते हैं। गाने अच्छे हैं, स्टाइलिंग शानदार है और हर फ्रेम बहुत महंगा लगता है। हालांकि, कलाकारों के बीच की केमिस्ट्री जमती नहीं है। फिल्म में हँसी के पल भी नकली और जबरदस्ती ठूँसे हुए लगते हैं।

संक्षेप में कहें तो: ‘कॉकटेल 2’ एक बेहद खूबसूरत दिखने वाली प्रेम कहानी है, जिसमें दुर्भाग्य से प्रेम ही गायब है। थिएटर से बाहर निकलते समय आपको इसके गाने, लोकेशन और कपड़े जरूर याद रहेंगे, लेकिन आप इसके किरदारों और कहानी को भूल जाना चाहेंगे।

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