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क्या बिना बीमा के पेट्रोल-डीजल नहीं मिलेगा? देश में 56% वाहन बिना बीमा के चल रहे हैं
देश की सड़कों पर थर्ड पार्टी इंश्योरेंस (बीमा) के बिना चल रहे वाहनों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सड़कों पर बड़ी संख्या में बिना बीमा वाले वाहनों को लेकर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने केंद्र सरकार को एक पायलट प्रोजेक्ट तैयार करने का निर्देश दिया है, जिसके तहत वैध बीमा न रखने वाले वाहनों को पेट्रोल पंप पर ईंधन (पेट्रोल-डीजल) देने से इनकार किया जा सकता है।
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर सड़क दुर्घटनाओं की संख्या और टोल प्लाजा पर लगने वाली वाहनों की लंबी कतारों पर भी ध्यान दिया। कोर्ट ने केंद्र सरकार से चयनित 5 कॉरिडोर पर ऐसी पायलट योजनाएँ लागू करने को कहा है, जिनसे टोल प्लाजा पर वाहनों को रोके बिना वहाँ से गुजरने वाले वाहनों की स्वचालित पहचान की जा सके।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम के उन प्रावधानों का उचित पालन नहीं हो रहा है, जिनके तहत सभी वाहनों के लिए 'थर्ड पार्टी' जोखिम को कवर करने वाला वैध बीमा अनिवार्य है। वित्त मंत्रालय से संबंधित संसदीय स्थायी समिति की 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय सड़कों पर चलने वाले लगभग 56 प्रतिशत वाहन बिना बीमा के हैं, जो अत्यंत चिंताजनक है।
कोर्ट ने कहा कि अदालत में हुई चर्चा के अनुसार 'इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया' (IRDAI) को सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के साथ विचार-विमर्श करके ऐसा पायलट प्रोजेक्ट तैयार करना चाहिए, जिसमें वाहनों को ईंधन देने की प्रक्रिया को उनके वैध बीमा की स्थिति से जोड़ा जाए। यदि वाहन का वैध बीमा नहीं होगा, तो जब तक वह बीमा नहीं करवा लेता, तब तक उसे पेट्रोल पंप से ईंधन नहीं मिलेगा।

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, इस व्यवस्था से दोहरा लाभ होगा—एक तो बिना बीमा या बिना पंजीकरण वाले वाहनों की पहचान होगी और दूसरा, वाहन मालिकों को कानूनी रूप से बीमा कराने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। यह योजना मोटर वाहन अधिनियम की धारा 146 के प्रावधानों का जमीनी स्तर पर पालन सुनिश्चित करेगी, जिसके लिए ANPR (ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन) कैमरों का उपयोग किया जा सकेगा। अदालत ने यह भी कहा कि पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय को भी सिद्धांततः इस पर कोई आपत्ति नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया कि 2018 में उसने नए चार-पहिया वाहनों के लिए खरीद या पंजीकरण के समय 3 वर्ष और दो-पहिया वाहनों के लिए 5 वर्ष की 'थर्ड पार्टी' बीमा पॉलिसी अनिवार्य की थी। उस आदेश के 8 वर्ष बाद भी बड़ी संख्या में वाहन बिना बीमा के हैं। हालांकि IRDAI और जनरल इंश्योरेंस काउंसिल ने इस अवधि को न बढ़ाने की सिफारिश की थी, लेकिन कोर्ट का मानना है कि सड़क सुरक्षा के हित में इस अवधि को 1 वर्ष बढ़ाया जाना चाहिए।
अब नए चार-पहिया वाहनों के लिए 4 वर्ष और नए दो-पहिया वाहनों के लिए 6 वर्ष की 'थर्ड पार्टी' बीमा पॉलिसी खरीदना अनिवार्य होगा। इस संबंध में IRDAI को तत्काल आवश्यक निर्देश जारी करने के लिए कहा गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने आँकड़े देते हुए कहा कि देश के कुल 30.48 करोड़ वाहनों में से 16.54 करोड़ वाहनों के पास बीमा ही नहीं है। इसके परिणामस्वरूप सड़क दुर्घटना के पीड़ितों को मुआवजा देने वाला कानूनी संरक्षण या तो देर से मिलता है या फिर विफल हो जाता है। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 146 के तहत अनिवार्य बीमा का उद्देश्य केवल दुर्घटना पीड़ितों को मुआवजा दिलाना नहीं है, बल्कि उन्हें लंबी कानूनी लड़ाई से बचाना भी है। बीमा न होने के कारण पीड़ितों और उनके परिवारों को समय पर उचित मुआवजा नहीं मिल पाता और लंबे समय तक अदालत में मामला चलने से मृत्यु या स्थायी दिव्यांगता के मामलों में परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है।

कोर्ट ने IRDAI और सड़क परिवहन मंत्रालय को कुछ राज्यों में 'इंश्योरेंस इंफॉर्मेशन ब्यूरो' और 'वाहन' (VAHAN) पोर्टल के डेटा से जुड़े ANPR कैमरे लगाने का निर्देश दिया है, ताकि बिना बीमा वाले वाहनों के स्वतः ई-चालान जारी किए जा सकें।
फिलहाल राज्य पुलिस के पास मौके पर बीमा की स्थिति की जांच करने के लिए कोई समान व्यवस्था नहीं है। इसलिए पुलिस को हैंडहेल्ड डिवाइस या डाउनलोड की जा सकने वाली ऐप उपलब्ध कराई जाएगी। इससे रियल-टाइम निगरानी संभव होगी और नियम उल्लंघन पर तुरंत चालान काटा जा सकेगा। इसके अलावा, IRDAI को निजी वाहन मालिकों के लिए बेसिक पॉलिसी के साथ ऐड-ऑन, पर्सनल एक्सीडेंट कवर और ओन-डैमेज कवर जैसे विकल्प उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया गया है।

