जेतलपुर स्वामिनारायण धाम का द्विशताब्दी महोत्सव: भागवत बोले- धर्म विभाजित नहीं करता बल्कि सबको जोड़ता है

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जेतलपुर। जेतलपुर स्वामिनारायण धाम। प्राण प्रतिष्ठा के 200 वर्ष पूरा होने पर द्विशताब्दी महोत्सव मनाया जा रहा है। इस मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के अलावा राज्य के राज्यपाल आचार्य देवव्रत भी कार्यक्रम में शामिल हुए। कहा जाता है कि  भगवान स्वामिनारायण द्वारा अपने हाथों से निर्मित नौ मंदिरों में से पांचवां मंदिर जेतलपुर स्वामिनारायण धाम है। यहां रेवती-बलदेवजी हरिकृष्ण महाराज की प्राण प्रतिष्ठा स्वयं भगवान स्वामिनारायण ने की थी।

इस प्राण प्रतिष्ठा के 200 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में भव्य उत्सव आयोजित किया गया है। इस मौके पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हरि-भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि किसी सीनियर से मिलकर जिस तरह जूनियर को खुशी होती है, वैसी ही खुशी उन्हें आज हो रही है। क्योंकि जो काम संघ पिछले 100 वर्षों से कर रहा है, वही कार्य स्वामिनारायण संप्रदाय 200 वर्षों से कर रहा है। उन्होंने कहा कि धर्म सबको जोड़ता है, विभाजित नहीं करता। हमें भी अपने जीवन में लोगों को जोड़ने का काम करना चाहिए और समाज में विभाजन नहीं आने देना चाहिए। जब भगवान ने ही सभी लोगों को बनाया है, तो जात-पात और ऊंच-नीच का सवाल ही कहां उठता है।

भेदभाव से धर्म और समाज दोनों को नुकसान: भागवत

मोहन भागवत ने कहा कि पुराने समय में जाति-वर्ण की व्यवस्था रही होगी, लेकिन उसमें भेदभाव नहीं था। व्यवस्था भेद के लिए नहीं होती। जब किसी व्यवस्था में भेदभाव की भावना प्रवेश कर जाती है, तो वह धर्म और समाज दोनों को नुकसान पहुंचाती है। उन्होंने कहा कि धर्म की रक्षा अपने आप होती है। आज की परिस्थितियों में पूरी दुनिया को रास्ता दिखाने का काम भारत को ही करना होगा। दुनिया के पास समस्याओं के समाधान नहीं हैं, हमें ही उनका समाधान करना होगा और उसके लिए हमें तैयार होना पड़ेगा।

रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं पर मंजिल सबकी एक ही है

आरएसएस प्रमुचा ने कहा कि जैसे 100 साल पहले संघ के संस्थापक ने हमें सिखाया और उसका अभ्यास कराया, वैसे ही 200 साल पहले स्वामिनारायण महाराज ने भी हमें शिक्षा दी। कार्य एक ही है, लेकिन रूप अलग-अलग हैं क्योंकि मानव समाज विविध है। हर व्यक्ति एक ही रास्ते पर नहीं चल सकता, क्योंकि हर व्यक्ति की रुचि और प्रकृति अलग होती है। इसलिए रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन मंजिल एक ही है। हमें इस समझ के साथ अपने-अपने मार्ग पर श्रद्धा से चलना चाहिए और एक-दूसरे के पूरक बनकर आगे बढ़ना चाहिए।

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