अद्भुत! देश के युवाओं में आध्यात्मिकता बढ़ रही है

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(उत्कर्ष पटेल)

आज के इस भागदौड़ भरे और तनावपूर्ण युग में, जहां युवाओं का जीवन स्क्रीन, प्रतिस्पर्धा और अनियमितता से भरा है, वहां एक अद्भुत परिवर्तन धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से हो रहा है। भारत के युवाओं में आध्यात्मिकता की एक लहर दौड़ गई है। एक ऐसी लहर जो युवाओं को विदेशी दौरों, लग्जरी शॉपिंग या पार्टियों के बजाय मंदिरों, तीर्थस्थलों और संस्कृति की जड़ों की ओर खींच रही है।

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अयोध्या के राम मंदिर के दर्शन के लिए युवाओं की लंबी कतारें, काशी विश्वनाथ के घंटों की गूँज में खोए हुए चेहरे, तिरुपति की सात किलोमीटर की चढ़ाई में भी उत्साह से भरे कदम, ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के समय आँखों में चमक और माताजी के शक्तिपीठों में भक्ति के आँसू-ये दृश्य आज के युवाओं की नई वास्तविकता बन गए हैं। कुंभ मेले की भीड़ में भी आधे से अधिक चेहरे 30 वर्ष से कम उम्र के देखे गए। सेतुसमुद्रम की पवित्रता, मथुरा-वृंदावन की रासलीला के रंग, और नए साल पर भी पार्टी के बजाय तीर्थयात्रा चुनने की युवाओं की यह प्रवृत्ति एक बड़ा संदेश देती है... भारत के युवा अपनी संस्कृति और धर्म के मूल्यों को भूले नहीं हैं।

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यह आध्यात्मिक जागृति केवल धर्म का पालन नहीं है, बल्कि एक गहरी आत्मीय चेतना है। आज के युवाओं को पता है कि बाहरी सफलता और भौतिक सुख संपत्ति क्षणभंगुर हैं। वे मन की शांति, आत्मविश्वास और जीवन का अर्थ खोज रहे हैं। भक्ति से मिलने वाली शक्ति उन्हें चिंताओं से दूर रखती है, रिश्तों की समझ देती है और जीवन की अनिश्चितताओं से लड़ने का साहस और आत्मविश्वास प्रदान करती है। एक जानकारी के अनुसार, आज 62% से अधिक युवा नियमित प्रार्थना करते हैं और 80% से अधिक ऑनलाइन आध्यात्मिक कंटेंट देखते हैं। ये आँकड़े मात्र संख्या नहीं हैं, बल्कि बदलती पीढ़ी की कहानी कहते हैं।

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देश के युवा जब मंदिरों में जाते हैं, तो वे केवल दर्शन नहीं करते, बल्कि अपनी संस्कृति को जीवित रखते हैं। वे हिंदू धर्म के मूलभूत सिद्धांतों-अहिंसा, सत्य, कर्म और भक्ति को अपने जीवन में उतार रहे हैं। यह एक ऐसी युवा पीढ़ी है जो विश्व को दिखा रही है कि आधुनिकता और आध्यात्मिकता के बीच कोई अंतर या भेद नहीं है; दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।

यदि युवाओं में ये संस्कार बने रहे, यदि ये युवा अपनी भक्ति और संस्कृति को संजोकर आगे बढ़ाएंगे, तो भारत एक बार फिर 'विश्वगुरु' बनने की अपनी यात्रा में मजबूत कदम बढ़ाएगा। हमारी संस्कृति, हिंदू धर्म की अमर शक्ति और आध्यात्मिक विरासत सुरक्षित रहेगी, सिर्फ इतिहास के पन्नों में नहीं, बल्कि जीवित रूप में, युवाओं के हृदय में।

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आज जब हम युवाओं को मंदिरों की ओर, देवी-देवताओं की ओर और अपनी जड़ों की ओर लौटते हुए देखते हैं, तो आशा, प्रेम और गर्व का अनुभव होता है। यह अमृतकाल का नया सूर्योदय है। भारत के युवाओं की आत्मा का, भक्ति का सूर्योदय। आइए, इस लहर को और मजबूत करें, इस भक्ति को और गहरा करें।

(लेखक एक प्रतिष्ठित उद्योगपति, समाजसेवी और khabarchhe.com के संस्थापक हैं।)

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