भारत का भविष्य देशभर में ट्रैफिक सिग्नलों पर भीख मांग रहा है!

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( उत्कर्ष पटेल)

हमारा देश भारत कई उतार-चढ़ाव देखने के बाद आज स्वतंत्र होने के गर्व और 'विकसित भारत' के संकल्प के साथ विश्वभर में लंबी छलांग लगा रहा है। यह बहुत अच्छी बात है और हमें गर्व भी होना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही हम क्या चूक रहे हैं और हमें क्या करना है, इस पर भी ध्यान देना होगा।

कहावत है न 'चिराग तले अंधेरा!' कुछ मामलों में जब ऐसा सच सामने आए, तो खुद काम पर लग जाना और लोगों को उस काम से जोड़ना ही नेक कार्य के लिए पहला कदम कहलाता है।

अपने देश के मुख्य शहरों के चौराहों और ट्रैफिक सिग्नलों को यदि आप ध्यान से देखेंगे, तो पाएंगे कि छोटे बच्चे, युवा और कम उम्र में मां बनी बहनें गोद में बच्चा लिए भीख मांग रही होती हैं। यह भारत का भविष्य है, जो ट्रैफिक सिग्नलों पर भीख मांग रहा है! भूखा पेट, मैले-फटे कपड़े, नंगे पैर और बचपन में ही कठोर हो चुकीं मैली हथेलियाँ जब भीख के लिए हाथ फैलाती हैं, तब कोई तिरस्कार से उन्हें दुत्कार देता है, तो किसी को दया आती है और वह अपने पास मौजूद रेजगारी से एक सिक्का या छोटी सी नोट उनके हाथ में रख देता है। चाहे कड़ी धूप हो, मूसलाधार बारिश हो या कड़ाके की ठंड, देश के ट्रैफिक सिग्नलों पर भारत का भविष्य भीख मांगता नजर आएगा।

यह दृश्य आज भी, इसी क्षण जब आप यह लेख पढ़ रहे होंगे, तब कई शहरों में देख सकेंगे। दिल्ली में लाखों की संख्या में, गुवाहाटी में हजारों, चेन्नई से मुंबई तक, अहमदाबाद, वडोदरा या फिर 'लघु भारत' कहे जाने वाले सूरत शहर में, हर लाल बत्ती पर ये नन्हे मैले हाथ फैलते हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, देश में हजारों बच्चे इस तरह भीख मांगने को मजबूर हैं। इनमें से कई अपहरण, तस्करी या परिवार के दबाव में हैं। यह केवल गरीबी की बात नहीं है; यह एक अंधकारमय व्यवस्था का परिणाम है जहां बच्चों को नशीली दवाएं देकर बीमार रखा जाता है, उन्हें मार-पीटकर रुलाया जाता है या उन्हें जानबूझकर दिव्यांग बनाया जाता है ताकि अधिक दया आए।

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इन्हें बेहतर भविष्य देने का काम कौन करेगा? दया आने पर हम मानवीय आधार पर छोटी-मोटी मदद तो कर देंगे, पर उससे उनका जीवन नहीं सुधरेगा। उन्हें जीवन की बुनियादी जरूरतें और शिक्षा देने का काम करना होगा। यदि सामाजिक संस्थाएं आगे आएं तो यह संभव है और यदि सरकार आगे आए तो भी हो सकता है। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है! कम से कम सरकार को आगे आकर यह काम करना ही चाहिए। और यदि इसके लिए सरकारी प्रावधान हैं, तो संबंधित विभाग काम क्यों नहीं कर रहे, इसकी जांच होनी चाहिए। चुने हुए राजनेताओं को यह सब क्यों नहीं दिखता?

इन बच्चों की आंखों में जब आशा की एक नन्हीं किरण जगमगाती है और वह लाल बत्ती के बंद होने के साथ ही धुंधली पड़ जाती है, तब संवेदनशील व्यक्ति की अंतरात्मा का कचोटना लाजिमी है। ये छोटी मैली हथेलियां जो आज भीख मांग रही हैं, अगर कल स्कूल की किताबें उठाएं तो भारत का सच्चा भविष्य बन सकती हैं। लेकिन जब तक हम आंखें मूंदकर बैठे रहेंगे, तब तक यह 'चिराग तले का अंधेरा' बढ़ता ही जाएगा।

हममें से हर किसी को अपने अंतर्मन से एक प्रश्न पूछना चाहिए:  जब मेरी कार लाल बत्ती पर रुकेगी, तब मैं क्या करूँगा? एक सिक्का देकर मन को शांत कर लूंगा या इस बच्चे की आंखों में झांककर अपने भीतर से बदलाव की शुरुआत करूंगा? ये बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं और यदि वे भीख मांगते रहेंगे, तो 'अमृतकाल' लज्जित होगा। हम सबको मिलकर इस अंधेरे को दूर करना होगा, क्योंकि जब तक एक भी बच्चा ट्रैफिक सिग्नल पर भीख मांगता रहेगा, तब तक 'विकसित भारत' का हमारा सपना अधूरा ही रहेगा।

इस लेख को पढ़कर यदि आपके हृदय में इन बच्चों के लिए संवेदना उमड़ती है, तो उस भावना को व्यर्थ न जाने दें। वही संवेदना हमें सही कार्य की ओर ले जाएगी, क्योंकि भारत का सच्चा भविष्य उन नन्हीं हथेलियों में है जो आज भीख मांग रही हैं; लेकिन कल यदि वे ही हाथ शिक्षित और आत्मनिर्भर होंगे, तो वे देश को 'विश्वगुरु' का पद दिलाने और उसे बनाए रखने में सहभागी बनेंगे।

 

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