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राजनेताओं के पीछे समय बर्बाद करने से अच्छा है परिवार को समय देना
(उत्कर्ष पटेल)
आज के समय में ज्यादातर लोगों का दिन राजनेताओं की बातों से शुरू होता है और उनकी चर्चा से खत्म होता है। मोबाइल पर न्यूज़ चैनल, सोशल मीडिया पर कमेंट्स और लाइक्स, व्हाट्सऐप ग्रुप में चर्चाएँ ये सब इतना सामान्य हो गया है। हम भूल जाते हैं कि हमारा समय कहां जा रहा है। राजनेता देश दुनिया की समाजव्यवस्था की घटनाओं से जुड़े हुए हैं लेकिन अपने परिवार को समय देना वास्तविक जीवन का महत्वपूर्ण काम है।
समय जीवन में मिली ऐसी भेंट है जो वापस नहीं मिलती। एक साल पहले जो बच्चा घुटनों के बल चलता था आज वह दौड़ता है। वयस्क माता पिता के हाथ जो कल मजबूत थे वे आज काँपते हैं। ये बदलाव धीरे धीरे होते हैं। अगर हम उन्हें देखने का समय न निकालें तो एक दिन अचानक ध्यान आता है कि सब कुछ बह गया। नित नई राजनीतिक चर्चा आती है और जाती है। सरकारें बदलती हैं, नेता बदलते हैं, वादे बदलते हैं। लेकिन परिवार की यादें वहीं की वहीं रह जाती हैं। जिस बच्चे के साथ हमने खेला, जिन माता पिता बुजुर्गों के साथ हमने बात की, जिस पति या पत्नी के साथ बैठे, जिन दोस्तों के साथ मासूम मस्ती की वही क्षण जीवन को वास्तविक सुख देते हैं।
कई बार हम ऐसा सोचते हैं कि राजनीति में रुचि लेना जागरूक नागरिक का कर्तव्य है। इस बात में सच्चाई है। देश के महत्वपूर्ण विषयों घटनाओं से अनजान रहना उचित नहीं है। लेकिन जागरूकता और लत के बीच फर्क है। जब हम घंटों तक एक ही विषय पर आक्रोश व्यक्त करें, अनजान लोगों के साथ बहस करें और घर में बैठे अपने लोगों को समय न दें तब वह जागरूकता नहीं बल्कि खलल बन जाती है। राजनेताओं का जीवन हमारे हाथ में नहीं है। उनके निर्णयों पर हमारा प्रभाव बहुत सीमित होता है। लेकिन अपने घर के माहौल पर हमारा सीधा प्रभाव पड़ता है। बच्चे को सुनना, वयस्क माता-पिता की सेवा करना, पति या पत्नी के साथ शांति से बात करना ये सब हमारे हाथ में है।
बहुत से लोगों की समझ है कि परिवार तो हमेशा रहेगा राजनीतिक घटना अभी चल रही है। इस विचार या समझ में गलती है। परिवार हमेशा नहीं रहता। लोग चले जाते हैं। अवसर चले जाते हैं। जो बच्चा आज आपसे बात करना चाहता है कल वह अपनी दुनिया में व्यस्त हो जाएगा। जो माता पिता बुजुर्ग आज आपका सुख देखकर आशीर्वाद देते हैं, कल शायद वे इस संसार में नहीं होंगे। राजनीतिक चर्चाएं आज कल और उसके बाद भी चलेंगी। नए मुद्दे आएंगे, नए नेता आएंगे। लेकिन आज का दिन और समय वापस नहीं आएगा।

खुद को प्रेरणा देने की शुरुआत छोटे निर्णयों से होती है। मोबाइल लैपटॉप एक तरफ रखकर घर के लोगों के साथ खाना खाना एक छोटा निर्णय है लेकिन उसका प्रभाव बड़ा है। बच्चे के होमवर्क में बैठना, माता-पिता को फोन करना, पत्नी या पति के साथ थोड़ी देर घूमने जाना, हल्के-फुल्के ढंग से बैठना ये सब अभी तो सभी को राजनीति की चर्चा से अधिक कठिन लगता है क्योंकि इसमें ध्यान और उपस्थिति चाहिए। राजनीति की चर्चा में हम दर्शक बन सकते हैं। परिवार में हमें सहभागी बनना पड़ता है और सहभागी बनना ही सच्चा जीवन है।
जीवन में शांति कहाँ से आती है? टीवी पर चल रही उग्र गर्म चर्चा से तो नहीं ही आएगी। शांति वहां से आती है जहाँ हम खुद को निहारकर देख सकें। जब संतान बच्चा खिलखिलाकर हंसता हो, जब वयस्क माता-पिता संतोष से बात करते हैं, जब घर में एक शांति होती है तभी मन हल्का होता है। राजनेताओं की सफलता या असफलता की चर्चाएं हमारे अंदर के असंतोष को शांत नहीं कर सकतीं। परिवार के साथ बिताया समय आपको असंतोष देगा।
इस बात का अर्थ यह नहीं है कि देश के महत्वपूर्ण विषयों के प्रति आँखें बंद कर लेनी चाहिए। वोट देना, घटनाओं और समाचारों को जानना, जरूरत पड़ने पर आवाज उठाना ये सब जरूरी है। लेकिन इसे जीवन का महत्वपूर्ण केंद्र बना देना आखिरकार तो नुकसानदायक ही है। जीवन का केंद्र तो वे लोग होने चाहिए जो हमारे साथ वास्तव में जीते हैं। जिनके साथ हमें जीना अच्छा लगता है। जो हमारी सफलता में खुश होते हैं और असफलता में साथ देते हैं।

सामान्यतः राजनेता हमारे दुख में आकर नहीं बैठते हमारा परिवार और दोस्त ही बैठते हैं। आज अगर कोई व्यक्ति स्वयं से पूछे कि पिछले एक महीने में मैंने कितना समय राजनीतिक चर्चा में बिताया और कितना समय परिवार के साथ सही मायने में बिताया तो जवाब अक्सर दुखद करने वाला आता है। यह प्रश्न पूछना ही स्वयं को सचेत करने की शुरुआत है। आज की शाम से मोबाइल कम चालू रखा जा सकता है। आज की रात से घर के लोगों के साथ थोड़ी अधिक बात की जा सकती है। ये छोटे निर्णय प्रयास ही धीरे धीरे जीवन की दिशा बदलते हैं।
अंत में एक सरल सत्य बात कहूंगा... राजनेताओं का काम गांव, शहर, राज्य या फिर देश चलाना है। हमारा काम अपना जीवन अच्छी तरह जीना है और अच्छा जीवन वह है जिसमें परिवार के स्वजनों दोस्तों के साथ बिताया गया समय अधिक महत्वपूर्ण हो। अनावश्यक चर्चाएं कम हों। परिवार को समय देना और परिवार के बीच ही जीना यह जिम्मेदारी है, प्रेम है, कर्तव्य है और सबसे महत्वपूर्ण है और यही सच्ची समृद्धि भी है।
(लेखक एक प्रतिष्ठित उद्योगपति, समाजसेवक और khabarchhe.com के संस्थापक हैं।)

