सोना-चांदी के बाद अब कॉपर की चमक, लेकिन यह आम आदमी के लिए कैसे महंगाई का संकेत है, किन-किन चीजों पर पड़ेगा असर?

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नई दिल्ली। अब तक निवेश और कारोबार की दुनिया में सोना-चांदी सबसे पसंदीदा धातु मानी जाती रही हैं, लेकिन औद्योगिक धातु तांबा यानी कॉपर तेजी से नया आकर्षण बन रहा है। दुनिया में बिजली, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक वाहन और रिन्यूएबल एनर्जी का विस्तार बढ़ने के साथ कॉपर की मांग लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर प्रमुख खदानों से उत्पादन में गिरावट और अमेरिका की संभावित टैरिफ नीति ने उपलब्ध सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है। यही वजह है कि लंदन मेटल एक्सचेंज पर कॉपर की कीमत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। अब लोगों का ध्यान सोना-चांदी से हटकर तांबे की ओर जा रहा है, इसमें भी निवेश का मौका ढूंढ रहे हैं।

14,533 डॉलर प्रति टन पर पहुंचा भाव

लंदन पर तीन महीने के बेंचमार्क कॉपर फ्यूचर्स ने 14,533 डॉलर प्रति मीट्रिक टन का नया ऑल टाइम हाई बना चुका है। इससे पहले जनवरी में 14,527.50 डॉलर प्रति टन का रिकॉर्ड बना था। बता दें कि इस साल अब तक कॉपर की कीमत करीब 16% बढ़ चुकी है। इस तेजी ने कई बड़े ब्रोकरेज के पुराने अनुमान भी पीछे छोड़ दिए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक गोल्डमैन सैक्स ने 2026 की चौथी तिमाही में कॉपर का भाव 11,200 डॉलर प्रति टन रहने का अनुमान लगाया था, जबकि ड्यूश बैंक ने एक साल की औसत कीमत 12,125 डॉलर प्रति टन रहने का अनुमान जताया था।

सिर्फ मांग नहीं बढ़ी, सप्लाई में कमी ने भी असर डाला

कॉपर की तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण वैश्विक सप्लाई पर बढ़ता दबाव है। इंटरनेशनल कॉपर स्टडी ग्रुप के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक 2026 की पहली छमाही में दुनिया का कॉपर-माइन उत्पादन 1.1% घटा है, जबकि कॉपर कंसंट्रेट का उत्पादन 2.6% कम हुआ। चिली, इंडोनेशिया और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में गिरावट दर्ज हुई। चिली में बारिश और बाढ़ जैसी घटनाओं का भी खनन पर असर पड़ा है। प्रमुख उत्पादक कंपनी एंटोफागास्टा ने 2026 का उत्पादन अनुमान घटाकर 6.25-6.55 लाख टन कर दिया है। उसके लॉस पेलाम्ब्रेस माइंस में खराब मौसम के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ। 

अमेरिका की दखलअंदाजी भी कॉपर के रेट को कर रहा प्रभावित

हालांकि तस्वीर पूरी तरह वैश्विक कमी की नहीं है। 2026 की पहली छमाही में रिफाइंड कॉपर का वैश्विक उत्पादन 2.4% बढ़ा और बाजार में करीब 1.31 लाख टन का शुरुआती सरप्लस भी रहा। लेकिन अमेरिका की ओर बड़ी मात्रा में कॉपर जाने से दूसरे बाजारों में उपलब्धता घट रही है।

अमेरिका की टैरिफ आशंका ने भी बढ़ाई खरीदारी

कॉपर की मौजूदा तेजी में अमेरिका की संभावित टैरिफ नीति की अहम भूमिका है। अमेरिकी खरीदार संभावित आयात शुल्क लागू होने से पहले कॉपर का स्टॉक बढ़ा रहे हैं। 2026 की पहली छमाही में अमेरिका ने करीब 8.85 लाख टन रिफाइंड कॉपर कैथोड आयात किया, जो पिछले साल की समान अवधि से करीब 3% अधिक और 2024 की पहली छमाही के मुकाबले दोगुने से ज्यादा है। इससे अमेरिका में कॉपर का भंडार बढ़ा है, जबकि लंदन मेटल जैसे दूसरे बाजारों में उपलब्ध स्टॉक घटा है। यानी बाजार में कुल धातु की कमी भले न हो, लेकिन अमेरिका के बाहर उपलब्ध कॉपर पर दबाव बढ़ गया है।

AI और बिजली के नेटवर्क ने बढ़ाई भविष्य की मांग

कॉपर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बिजली का बेहतरीन चालक है। AI आधारित डेटा सेंटर, बिजली के नए ग्रिड, इलेक्ट्रिक वाहन, रिन्यूएबल एनर्जी और बैटरी स्टोरेज जैसी तकनीकों के विस्तार में इसकी जरूरत बढ़ रही है। डेटा सेंटरों में बिजली पहुंचाने वाली केबल, ट्रांसफॉर्मर, स्विचगियर और नेटवर्क उपकरणों में कॉपर का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के मुताबिक कॉपर उन महत्वपूर्ण खनिजों में शामिल है जिनकी भविष्य की मांग और सप्लाई के बीच अंतर चिंता का विषय बना हुआ है। मौजूदा परियोजनाओं के आधार पर 2035 तक कॉपर की संभावित सप्लाई में करीब 25% का अंतर रहने का अनुमान है।

बढ़ती कीमतों से कॉपर कंपनियों के शेयर भी चमके रहे 

कॉपर के भाव में तेजी का असर इससे जुड़ी कंपनियों के शेयरों पर भी दिख रहा है। भारतीय बाजार में गिरावट के बावजूद हिंदुस्तान कॉपर का शेयर करीब 5% चढ़ा। इसके अलावा वेदांता और हिंडाल्को इंडस्ट्रीज के शेयर भी बढ़त के साथ कारोबार करते रहे। कॉपर की ऊंची कीमतें उत्पादकों के लिए आम तौर पर बेहतर कमाई का मौका बनाती हैं।

कॉपर महंगा हुआ तो इन चीजों की लागत बढ़ सकती है

कॉपर इलेक्ट्रिकल वायर और केबल का प्रमुख कच्चा माल है। कीमत लंबे समय तक ऊंची रही तो केबल कंपनियों की लागत बढ़ सकती है और इसका कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंच सकता है। कॉपर की रिकॉर्ड तेजी के बीच वायर-कैबल कंपनियों के मार्जिन पर दबाव की चिंता भी सामने आई है।

इलेक्ट्रिक वाहन: EV में बैटरी के अलावा मोटर, वायरिंग, चार्जिंग सिस्टम और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स में कॉपर का इस्तेमाल होता है। इसलिए कॉपर की लगातार तेजी से वाहन निर्माण लागत पर दबाव पड़ सकता है।

एसी और इलेक्ट्रॉनिक्स: एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर, मोटर, ट्रांसफॉर्मर और कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में कॉपर की जरूरत होती है। कच्चे माल की कीमत बढ़ने पर कंपनियों के लिए उत्पादन लागत बढ़ सकती है।

बिजली का इंफ्रास्ट्रक्चर: ट्रांसमिशन लाइन, सब-स्टेशन, ट्रांसफॉर्मर और नए पावर ग्रिड में कॉपर का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। इसलिए बिजली नेटवर्क के विस्तार की लागत भी प्रभावित हो सकती है।

रिन्यूएबल एनर्जी और डेटा सेंटर: सोलर, विंड पावर, बैटरी स्टोरेज और AI डेटा सेंटरों के विस्तार से कॉपर की मांग बढ़ रही है। इससे एक तरफ इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ेगा, लेकिन दूसरी तरफ परियोजनाओं की लागत पर भी दबाव आ सकता है।

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