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मां की दूसरी शादी के बाद क्या मिलेगा बच्चों को भरण-पोषण? कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला
पति-पत्नी के बीच होने वाले झगड़ों में अक्सर बच्चों को नुकसान उठाना पड़ता है। ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाईकोर्ट में पहुंचा, जहां नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण भत्ते को लेकर विवाद था। पति ने दलील दी थी कि महिला ने दोबारा विवाह कर लिया है, इसलिए अब वह अपने बच्चों के लिए भरण-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं है। फैमिली कोर्ट ने भी उसके पक्ष में फैसला दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को पलट दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि, 'पति-पत्नी के बीच के विवाद उनके नाबालिग बच्चों के कानूनी अधिकारों को प्रभावित नहीं करते। यदि महिला दूसरा विवाह कर लेती है, तब भी उसके नाबालिग बच्चों का अपने जैविक पिता से भरण-पोषण प्राप्त करने का कानूनी अधिकार बना रहता है।' एक रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति पद्म नारायण मिश्रा ने एक महिला और उसके नाबालिग बच्चों द्वारा दायर याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यह बात कही। 20 मई के आदेश में न्यायमूर्ति पद्म नारायण मिश्रा ने कहा कि एक पति पर अपने नाबालिग बच्चों के पालन-पोषण का खर्च उठाने की एकमात्र जिम्मेदारी होती है।
जस्टिस पद्म नारायण मिश्रा ने आगे कहा कि इस जिम्मेदारी से मुक्ति केवल कानून के तहत ही मिल सकती है, जिसे विधि में मान्यता प्राप्त है। यह जिम्मेदारी न तो दंपति के बीच वैवाहिक विवादों के कारण समाप्त होती है और न ही मां के कथित पुनर्विवाह से खत्म होती है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोहराया कि सीआरपीसी की धारा 125 (पत्नी, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण) सामाजिक न्याय का एक साधन है। इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं, बच्चों और माता-पिता को ऐसे मामलों में आर्थिक तंगी से बचाना है, जहां उन्हें त्याग दिया गया हो।
अपने आदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लेख किया, जिनमें कहा गया है कि भरण-पोषण संबंधी कानून आर्थिक अभाव से सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट के ये फैसले अन्य सभी बातों से ऊपर बच्चों के कल्याण को प्राथमिकता देते हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि दूसरा विवाह करने या विवाहेतर संबंध रखने से कोई महिला अपने भरण-पोषण के अधिकार को खो सकती है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि नाबालिग बच्चे भी अपने जैविक पिता से भरण-पोषण पाने का अधिकार खो दें। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि नाबालिग बच्चों को अपने जैविक पिता से भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार है।

