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सूरत में SIR की प्रक्रिया पूरी; 48.73 लाख में से 13.19 लाख वोटर के नाम कटे, चुनाव पर दिखेगा असर
सूरत। मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। सूरत में योग्य मतदाताओं की संख्या में बड़ी कमी आई है। पहले जहां सूरत में 48 लाख से ज्यादा वोटर रजिस्टर्ड थे, वहीं अब केवल साढ़े 35 लाख ही रह गए हैं। सूरत के निर्वाचन आयोग के कार्यालय से जारी आंकड़ों के अनुसार 13 लाख से ज्यादा लोगों के नाम मतदाता सूची से बाहर हो गए हैं। इनमें वैसे लोग हैं जो या तो मृतक थे, या डुप्लीकेट थे, जिनके दो जगह नाम थे। सूरत में बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं, ऐसे लोगों के नाम काटे गए हैं। हालांकि जिन्हें लगता है कि उनका नाम गलत कट गया है तो वे फिर से फॉर्म 6 के जरिए आवेदन कर सकते हैं या फिर सीधे चुनाव आयोग के वेबसाइट पर जाकर नाम जोड़ने के लिए आवेदन कर सकते हैं।
अब जबकि अंतिम मतदाता सूची जारी हो चुकी है तो इसका असर चुनाव पर भी दिखेगा। अभी सूरत में मनपा का चुनाव होना है तो इसका असर देखने को मिल सकता है। चुनावी गणित का समीकरण बदल सकता है। दरअसल, जिले के कुल 48.73 लाख मतदाताओं में से 13.19 लाख नाम हटा दिए गए हैं, जिससे औसतन 27 प्रतिशत मतदाता कट गए हैं। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं: प्रवासी मतदाताओं ने सूरत से नाम हटाकर अपने मूल स्थान पर रखा और कई मतदाता स्थानांतरित हो गए।
यही कारण है कि अप्रैल में होने वाले म्युनिसिपल चुनाव में जीत-हार का गणित बदल जाएगा। विधानसभा में भाजपा की स्थिति मजबूत है, लेकिन म्युनिसिपल चुनाव में 4 उम्मीदवारों के बीच वोटों के बंटवारे के कारण सीधा असर होगा। विशेष रूप से उधना, करंज, वराछा और लिम्बायत में तो 40 प्रतिशत तक मतदाता कट गए हैं।
बड़ी संख्या में नाम कटने के बाद राजनीतिक पार्टियां भी हुई सचेत
मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम कटने के बाद राजनीतिक पार्टियां भी सचेत हो गई हैं। इस नुकसान की भरपाई के लिए मैदान में उतर रह हैं। बूथ स्तर संपर्क, घर-घर अभियान और नए मतदाताओं की पंजीकरण पर खास फोकस कर रही है। युवाओं और प्रवासी वर्ग को जोड़ने के लिए संगठन तंत्र अधिक सक्रिय हुआ है। आगामी समय में राजनीतिक पार्टियां नए मतदाताओं को जोड़ने का प्रयास शुरू करेंगी।
उधना, वराछा में मतदान पैटर्न बदल सकता है
बता दें कि उधना, करंज, वराछा और लिम्बायत सीटों में पारंपरिक मतदान पैटर्न बदल सकता है। यहां ज्यादातर श्रमिक और बार-बार स्थानांतरित होने वाले लोग रहते हैं, जिससे कुछ पार्टियों की मजबूत मानी जाने वाली वोटबैंक पर सीधा असर पड़ेगा। पहले हजारों वोटों से जीतने वाली सीटों पर अब जोरदार टक्कर देखने को मिलेगा। अंतर में भी काफी कम मार्जिन रह जाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, कम मतदाता मतलब कम मतदान प्रतिशत। यह सीधे-सीधे परिणामों को प्रभावित कर सकता है।

