आंख के इलाज में डॉक्टर पर लापरवाही का आरोप लगाने वाली शिकायत कोर्ट ने खारिज की

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सूरत जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (अतिरिक्त आयोग) ने चिकित्सीय लापरवाही के एक महत्वपूर्ण मामले में अस्पताल और डॉक्टर के पक्ष में फैसला देते हुए, शिकायतकर्ता द्वारा मुआवजे की मांग वाली शिकायत को पूरी तरह खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि केवल आरोपों के आधार पर डॉक्टर की लापरवाही साबित नहीं होती, इसके लिए ठोस चिकित्सीय साक्ष्य अनिवार्य हैं।

शिकायतकर्ता द्वारा सूरत जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (अतिरिक्त) के समक्ष जीवन ज्योत डायग्नोस्टिक एंड हेल्थ सेंटर तथा डॉ. पथिक वेरावलिया के खिलाफ दायर शिकायत के अनुसार, अडाजन, सूरत के निवासी और बढ़ई का काम करने वाले शिकायतकर्ता की बाईं आंख में लोहे का एक कण लगने से गंभीर चोट लगी थी। वे इलाज के लिए उधना मेन रोड स्थित ‘जीवन ज्योत डायग्नोस्टिक एंड हेल्थ सेंटर’ पहुंचे थे। अस्पताल के प्रसिद्ध रेटिना सर्जन डॉ. पथिक वेरावलिया ने जांच के बाद मरीज की दोनों आंखों की दृष्टि बचाने के लिए तत्काल ऑपरेशन आवश्यक होने की सलाह दी थी। मरीज की सहमति प्राप्त करने के बाद बाईं आंख से लोहे का कण सफलतापूर्वक निकाल दिया गया था और आंख में विशेष गैस भरी गई थी।

इसके बाद शिकायतकर्ता ने उपभोक्ता अदालत में यह आरोप लगाते हुए मामला दायर किया कि ऑपरेशन के बाद अस्पताल और डॉक्टर की लापरवाही के कारण उनकी आंख की दृष्टि धुंधली हो गई है और वे बढ़ई का काम करने में असमर्थ हो गए हैं। उन्होंने ऑपरेशन का खर्च, मानसिक उत्पीड़न और आजीविका के नुकसान के लिए मुआवजे की मांग की थी।

अस्पताल और डॉक्टर की ओर से सूरत के प्रसिद्ध अधिवक्ता एडवोकेट श्रेयस एस. देसाई, एडवोकेट प्राची अर्पित देसाई और एडवोकेट ईशान देसाई उपस्थित हुए। उन्होंने आयोग के समक्ष सटीक कानूनी और चिकित्सीय तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा कि मरीज की आंख में गंभीर ट्रॉमा था और यदि तत्काल ऑपरेशन करके लोहे का कण नहीं निकाला जाता, तो मरीज की दोनों आंखों की दृष्टि चली जाती। डॉक्टर ने पूरी सावधानी और सतर्कता के साथ सफल ऑपरेशन कर मरीज की आंखें बचा ली थीं।

ऑपरेशन के बाद भी मरीज को आवश्यक फॉलो-अप जांच, कैटरैक्ट (मोतियाबिंद) और लेजर उपचार की सलाह दी गई थी, लेकिन मरीज स्वयं आगे का उपचार कराने के लिए तैयार नहीं था। शिकायतकर्ता ने जिन अन्य अस्पतालों (सिविल अस्पताल और राजकोट के अस्पताल) में जांच कराई थी, वहां की किसी भी रिपोर्ट में यह नहीं दर्शाया गया कि डॉ. पथिक वेरावलिया ने ऑपरेशन में कोई गलती की थी या लापरवाही बरती थी। ठोस साक्ष्यों के बिना केवल मौखिक आरोपों के आधार पर मामला सिद्ध नहीं किया जा सकता।

इसके अलावा, उपचार के दौरान सभी स्वीकृत चिकित्सीय मानकों का पालन किया गया था और चिकित्सा सेवा में किसी भी प्रकार की कमी नहीं थी। साथ ही यह कानूनी दलील भी दी गई कि अस्पताल एक सार्वजनिक ट्रस्ट द्वारा संचालित है, इसलिए ट्रस्ट और उसके ट्रस्टियों को पक्षकार बनाए बिना शिकायत विधिसम्मत रूप से विचारणीय नहीं है।

सूरत जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (अतिरिक्त) के अध्यक्ष (प्रभारी) के. जे. दसोंदी और सदस्य (प्रभारी) पूर्वी वी. जोशी की पीठ ने उल्लेख किया कि डॉक्टर ने पर्याप्त चिकित्सीय कौशल और सावधानी के साथ ऑपरेशन कर लोहे का कण निकाल दिया था, जिसमें कोई कमी सिद्ध नहीं होती। शिकायतकर्ता डॉक्टर की लापरवाही सिद्ध करने के लिए कोई भी ठोस या विश्वसनीय चिकित्सीय साक्ष्य अथवा विशेषज्ञ की राय प्रस्तुत करने में पूरी तरह विफल रहे।

परिणामस्वरूप, सूरत जिला उपभोक्ता आयोग ने अस्पताल और डॉक्टर की ओर से प्रस्तुत कानूनी दलीलों को स्वीकार करते हुए शिकायतकर्ता की उपभोक्ता शिकायत को पूरी तरह खारिज करने का आदेश दिया।

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