धार: भोजशाला में अयोध्या 2.0... क्या इस कानूनी फैसले से अब काशी और मथुरा का भी रास्ता होगा साफ?

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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद धार स्थित भोजशाला एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गई है। ASI की सर्वे रिपोर्ट और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर कोर्ट ने भोजशाला परिसर को हिंदू मंदिर माना है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि मुस्लिम पक्ष चाहे तो मस्जिद निर्माण के लिए सरकार से अलग भूमि की मांग कर सकता है। इस फैसले के बाद अब अयोध्या की तरह काशी, मथुरा और देशभर के अन्य मंदिर-मस्जिद विवादों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि 98 दिनों तक चले ASI सर्वेक्षण में अनेक ऐसे प्रमाण मिले हैं जो साबित करते हैं कि भोजशाला देवी वाग्देवी अर्थात माता सरस्वती की पूजा और संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। कोर्ट ने 2003 के ASI के उस आदेश को भी रद्द कर दिया जिसमें हिंदू पक्ष को पूजा से रोका गया था, जबकि मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति दी गई थी।

कोर्ट ने अपने फैसले में अयोध्या केस के निर्णय का भी उल्लेख किया और कहा कि अदालत आस्था नहीं बल्कि साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देती है। फैसले में कहा गया कि उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज, शिलालेख, मूर्तिकला, स्तंभ और ASI की रिपोर्ट संकेत देती है कि यहां मस्जिद से पहले प्राचीन मंदिर था।

अब इस फैसले के बाद यह सवाल उठ रहे हैं कि भारत पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। अयोध्या और भोजशाला के बाद क्या अब काशी और मथुरा के मंदिरों पर भी फैसला आएगा? क्या अब मुस्लिम पक्ष को देशभर के उन 299 स्थलों से जुड़े मामलों में कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, जहां दावा किया जाता है कि मंदिर तोड़कर मस्जिदें बनाई गई थीं? मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले के जवाब में मुस्लिम पक्ष ने कहा है कि वह इस निर्णय को स्वीकार नहीं करता और इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगा।

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गौरतलब है कि भोजशाला मामला अयोध्या विवाद की तरह बेहद संवेदनशील रहा है, जिसमें दो से अधिक बार हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे हो चुके हैं। इन दंगों का मुख्य कारण परस्पर विरोधी दावे रहे हैं। मुस्लिम पक्ष दावा करता है कि भोजशाला परिसर एक मस्जिद है, जबकि हिंदू पक्ष इसे देवी वाग्देवी का मंदिर मानता है। और ऐतिहासिक साक्ष्य, दस्तावेज, पुस्तकें तथा शिलालेख इस दावे का समर्थन करते हैं।

दरअसल, मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला का नाम राजा भोज के नाम पर रखा गया था, जो देवी सरस्वती के परम भक्त थे। हिंदू धर्म में देवी सरस्वती को विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी माना जाता है। ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि 1034 में राजा भोज ने यहां नालंदा और तक्षशिला जैसी प्रसिद्ध संस्थाओं की तर्ज पर एक संस्कृत कॉलेज की स्थापना की थी, जिसे बाद में भोजशाला कहा जाने लगा। चूंकि इस भोजशाला में देवी सरस्वती की प्रतिमा स्थापित थी, इसलिए हिंदू लंबे समय से इस स्थान को देवी को समर्पित पवित्र मंदिर मानते रहे हैं।

हालांकि, जिस प्रकार बख्तियार खिलजी ने 12वीं सदी में नालंदा विश्वविद्यालय पर हमला करवाया था, उसी प्रकार अलाउद्दीन खिलजी ने 1305 में भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति को समाप्त करने के प्रयास में भोजशाला को ध्वस्त करने का आदेश दिया था। इसके बाद 1401 में दिलावर खान गौरी ने भोजशाला परिसर के एक हिस्से में एक मस्जिद बनवाई, जिसे कमाल मौला मस्जिद कहा गया। जबकि 1514 में महमूद शाह खिलजी ने यहां दूसरी मस्जिद का निर्माण करवाया, जिसे लाट मस्जिद कहा गया।

इन निर्माणों में कमाल मौला मस्जिद मालवा क्षेत्र के सूफी संत कमाल मौला को समर्पित थी। लेकिन विभिन्न ऐतिहासिक कालों में किए गए सर्वेक्षणों में लगातार यह उल्लेख मिलता रहा है कि यह मस्जिद उसी स्थान पर बनाई गई थी जहां कभी प्राचीन मंदिर और भोजशाला कॉलेज था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की 123 वर्ष पुरानी रिपोर्ट भी बताती है कि मस्जिद के भीतर मिले अनेक प्रतीक और शिलालेख यह संकेत देते हैं कि यह संरचना हिंदू मंदिर के अवशेषों पर बनाई गई थी, और मंदिर के ध्वंस से प्राप्त मलबे तथा अवशेषों का उपयोग निर्माण सामग्री के रूप में किया गया था।

इसी रिपोर्ट में लिखा गया था कि मस्जिद के उस कक्ष में, जहां मुसलमान नमाज पढ़ते थे, वहां दो स्तंभों पर संस्कृत अक्षर और हिंदू प्रतीक मिले थे तथा कुछ दीवारों पर संस्कृत शिलालेख पाए गए थे। ये प्रमाण इस दावे का समर्थन करते हैं कि जहां मस्जिद का निर्माण हुआ था, वहां पहले मंदिर था। यह रिपोर्ट भाजपा या मोदी सरकार के कार्यकाल में सामने नहीं आई थी। यह रिपोर्ट 123 वर्ष पुरानी है। अंग्रेजों ने स्वयं दस्तावेजीकरण किया था कि जब उन्होंने भोजशाला में सर्वेक्षण हेतु खुदाई करवाई थी, तब वहां उन्हें देवी सरस्वती की प्रतिमा मिली थी। बाद में वे इस प्रतिमा को लंदन ले गए, जहां वह आज भी ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है, और इस प्रतिमा को जैन धर्म से जुड़ा हुआ भी माना जाता है।

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2024 में भी कोर्ट के आदेश पर ASI ने भोजशाला का सर्वे किया था। इस सर्वेक्षण के दौरान 31 सिक्के मिले थे, जिनमें से कई 10वीं और 11वीं सदी के थे। उस समय भारत में कहीं भी एक भी मस्जिद का निर्माण नहीं हुआ था। अब इन्हीं प्रमाणों के आधार पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धार स्थित भोजशाला को मंदिर के रूप में मान्यता दी है। अयोध्या फैसले के बाद यह दूसरा मामला है जिसमें कोर्ट ने हिंदू पक्ष के दावों को सही माना है। इस फैसले के बाद अब बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या अन्य लंबित मामलों में भी इसी प्रकार के निर्णय दिए जाएंगे?

इस समय मंदिर-मस्जिद से जुड़े 10 मामले अदालतों में पहुंच चुके हैं। जिन राज्यों में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं, वहां 6 मामले हैं। इनमें सबसे अधिक 6 मामले उत्तर प्रदेश में हैं और इसके बाद मध्य प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान तथा कर्नाटक में 1-1 मामला है, जहां हिंदू पक्ष दावा करता है कि वर्तमान मस्जिदें और दरगाहें प्राचीन मंदिरों को तोड़कर बनाई गई हैं।

एक पुस्तक है ‘Hindu Temples: What Happened To Them’, जिसमें दावा किया गया है कि देशभर में तोड़े गए मंदिरों के स्थानों पर 1,800 से अधिक मस्जिदें और इस्लामी ढांचे बनाए गए हैं। इनमें से उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 299 मस्जिदों के नीचे मंदिर होने का दावा किया जाता है। इसी प्रकार कर्नाटक में 192, तमिलनाडु में 175, गुजरात में 170, राजस्थान में 170 और मध्य प्रदेश में 153 ऐसे मस्जिद और इस्लामी ढांचे बताए जाते हैं, जिनके बारे में दावा है कि वे प्राचीन मंदिरों को तोड़कर तथा उनके मलबे का उपयोग करके बनाए गए हैं।

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अब यह बात हाल ही में सामने नहीं आई है, बल्कि कई वर्षों से उठती रही है। इसे ध्यान में रखते हुए कांग्रेस सरकार 1991 में वर्शिप एक्ट लेकर आई थी। इस कानून ने अयोध्या विवाद को छोड़कर बाकी सभी धार्मिक स्थलों पर 15 अगस्त 1947 की यथास्थिति लागू कर दी, जिससे हिंदू पक्ष के लिए अपने प्राचीन मंदिरों पर दावा करने का कानूनी अधिकार सीमित हो गया। जब यह कानून बनाया गया था, तब भाजपा ने काशी और मथुरा के मामलों को अयोध्या की तरह अपवादों की सूची में शामिल करने की मांग की थी।

लेकिन जब कांग्रेस सरकार ने ऐसा करने से इनकार कर दिया, तब विपक्ष में रही भाजपा ने इस कानून का तीव्र विरोध किया था; मतदान प्रक्रिया के दौरान उसके सांसदों ने वॉकआउट भी किया था। इससे यह सवाल भी उठता है कि उस समय इस कानून का विरोध करने वाली भाजपा क्या अब काशी और मथुरा जैसे मामलों को आसान बनाने के लिए इसे रद्द करेगी? और क्या इस कदम से हिंदू पक्ष के लिए कानूनी रास्ता खुलेगा?

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