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2 चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को भी शिकायत पत्र लिखा था, लेकिन सचिवालय ने कोई कार्रवाई नहीं की, ज्ञानेश कुमार पर उठे सवाल...
चुनाव आयोग में आंतरिक मतभेदों की खबरों और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देशभर में हुए विरोध प्रदर्शनों के बीच एक बड़ा खुलासा सामने आया है। RTI से मिली जानकारी के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के कथित दुर्व्यवहार को लेकर कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा था। कैबिनेट सचिवालय ने यह पत्र मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यालय को भेज दिया था। यह भी सामने आया है कि कैबिनेट सचिवालय ने इन शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं की।
RTI के तहत प्राप्त फाइल नोटिंग से पता चला है कि कैबिनेट सचिवालय ने इस पत्र पर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की राय लेने का प्रस्ताव रखा था। RTI कार्यकर्ता कमोडोर लोकेश बत्रा (सेवानिवृत्त) की ओर से दायर RTI के जवाब में मिले दस्तावेजों से कुछ अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां भी सामने आई हैं।
जानकारी के मुताबिक, सचिवालय ने चुनाव आयुक्तों की शिकायतों पर कहा था कि उन्होंने ये शिकायतें अपनी व्यक्तिगत हैसियत में की थीं। चूंकि चुनाव आयोग की ओर से कोई आधिकारिक पत्र नहीं मिला था, इसलिए इस स्तर पर किसी भी तरह की कार्रवाई करना अनुचित माना जा सकता था।
RTI से क्या खुलासा हुआ?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, 3 अगस्त को सचिवालय ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की राय लेने का प्रस्ताव रखा था। वहीं, 5 अगस्त की एक नोटिंग में कहा गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों का पत्र उनकी व्यक्तिगत हैसियत में भेजा गया था, न कि चुनाव आयोग के किसी आधिकारिक निर्देश के तहत।
सचिवालय ने कहा कि ऐसी किसी भी कार्रवाई से बचना चाहिए, जिसे एक संवैधानिक संस्था के कामकाज में हस्तक्षेप माना जा सकता है। इसके बाद 5 अगस्त को कैबिनेट सचिवालय ने दोनों चुनाव आयुक्तों को केवल यह सूचित किया कि उनका पत्र प्राप्त हो गया है। इस पत्र की प्रतियां कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के सचिव, अन्य अधिकारियों और मुख्य चुनाव आयुक्त के निजी सचिव को भी भेजी गई थीं।
गौरतलब है कि लोकेश बत्रा ने 24 सितंबर को RTI आवेदन दाखिल किया था। इसके जवाब में मिले पत्रों से पता चलता है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 29 जुलाई को देश के शीर्ष नौकरशाह टी.वी. सोमनाथन को दो अलग-अलग, लेकिन एक जैसे पत्र लिखे थे।
सुखबीर संधू के पत्र के साथ 28 जुलाई को मनीष गर्ग की ओर से जारी एक आदेश की प्रति भी संलग्न थी। इस आदेश में गर्ग ने अपने साथ-साथ चुनाव आयोग के अन्य अधिकारियों के कामकाज का बंटवारा किया था। अब समझते हैं कि चुनाव आयुक्तों ने आखिर शिकायत क्यों की थी।
चुनाव आयुक्तों ने ये पत्र क्यों लिखे?
यह पूरा विवाद IT विभाग में फाइलों की आवाजाही और काम के बंटवारे को लेकर शुरू हुआ था।
29 जुलाई को कैबिनेट सचिव को भेजे गए गोपनीय पत्रों में दोनों चुनाव आयुक्तों ने आरोप लगाया था कि 28 जुलाई को जब उप चुनाव आयुक्त (DEC) भानु प्रकाश येतुरु छुट्टी पर थे, तब मनीष गर्ग को प्रशासनिक विभाग का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था।
गर्ग ने यह जिम्मेदारी संभालने के कुछ ही घंटों के भीतर वरिष्ठ अधिकारियों, जैसे IT महानिदेशक सीमा खन्ना, के कामकाज के बंटवारे का आदेश जारी कर दिया था।
चुनाव आयुक्तों का कहना था कि इस संबंध में मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18(1) और 18(2) के तहत उनसे कोई सलाह नहीं ली गई थी। चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने यह भी आरोप लगाया था कि उन्होंने विभाग से जो फाइल मांगी थी, वह उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई।
यह मामला इतना संवेदनशील क्यों है?
यह खुलासा ऐसे समय में सामने आया है, जब चुनाव आयोग का IT विभाग और उसकी प्रमुख सीमा खन्ना एक बड़े विवाद के केंद्र में हैं। हालिया मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सीमा खन्ना की ओर से लागू की गई और चुनाव आयोग द्वारा मंजूर नई IT प्रणाली ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों यानी निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ERO) के डेटाबेस तक पहुंच को काफी सीमित कर दिया था। इससे विवाद खड़ा हुआ और सीमा खन्ना चर्चा के केंद्र में आ गईं। द इंडियन एक्सप्रेस की एक विशेष रिपोर्ट में ये खुलासे किए गए थे।
रिपोर्टों में यह दावा भी किया गया था कि पिछले 10 महीनों के दौरान चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के फैसलों से 14 बार असहमति जताई थी, लेकिन उनकी आपत्तियों को नजरअंदाज कर दिया गया।
हालांकि, चुनाव आयोग ने इन सभी दावों को खारिज किया है। आयोग ने कहा है कि भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) अपने सभी फैसले नियमों के अनुसार सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर लेता है।

