- Hindi News
- बिजनेस
- कैंसर की दवा 2700 रुपये की, लेकिन MRP 27 हजार; जज ने कहा- यह तो मरीजों के साथ ‘दिनदहाड़े डकैती’ है, ऐ...
कैंसर की दवा 2700 रुपये की, लेकिन MRP 27 हजार; जज ने कहा- यह तो मरीजों के साथ ‘दिनदहाड़े डकैती’ है, ऐसी कई दवाओं पर सवाल
नई दिल्ली। जीवनरक्षक दवाओं, खासकर कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतों में भारी अंतर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने इसे गंभीर विषय बताया। मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष कोर्ट ने उदाहरण भी दिया। इस दवा का अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी 27,000 रुपये छपा था, जबकि वही दवा रिटेलर को महज 2700 रुपये में उपलब्ध कराई जा रही थी। कीमत में दस गुना के अंतर पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस संदीप मेहता ने इसे मरीजों के साथ ‘दिनदहाड़े डकैती’ बताया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सवाल किया कि जब कोई दवा निर्माता से रिटेलर तक करीब 10 फीसदी कीमत पर पहुंच रही है, तो उसका एमआरपी इतना अधिक क्यों रखा गया है। अदालत ने यह भी पूछा कि जरूरी दवाओं की कीमतों में इतने बड़े अंतर की अनुमति आखिर किस व्यवस्था के तहत दी जा रही है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जिन अधिकारियों को ऐसे मामले में कार्रवाई करनी चाहिए थी, वो बिल्कुल चुप हैं।
कीमत तय करने के तरीके पर सवाल
बता दें कि मामले की सुनवाई दवाओं की कीमत, अनिवार्य जेनेरिक दवाओं के इस्तेमाल और मेडिकल डिवाइस की कीमतों को नियंत्रित करने की मांग वाली याचिकाओं पर हो रही है। याचिकाकर्ता किशन चंद जैन ने अदालत के सामने दलील दी कि ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर यानी DPCO, 2013 के तहत करीब 82 प्रतिशत दवाएं लिस्टेड कैटेगरी से बाहर है। बता दें कि DPCO में सरकार द्वारा तय सीलिंग प्राइस का प्रावधान अनुसूचित फॉर्मूलेशन के लिए है। गैर-अनुसूचित दवाओं के मामले में शुरुआती कीमत तय करने को लेकर याचिका में अधिक नियंत्रण की मांग की गई है।
ज्यादातर दवाओं के लिए कीमतों पर नियंत्रण पर्याप्त नहीं
याचिकाकर्ता का दावा है कि बाजार में करीब 82% दवाएं गैर-अनुसूचित श्रेणी में आती हैं। उनका कहना है कि इन दवाओं की शुरुआत में तय की जाने वाली कीमत पर पर्याप्त नियंत्रण नहीं है। यही वजह है कि अदालत के सामने MRP और रिटेलर को मिलने वाली कीमत के बीच भारी अंतर का मुद्दा उठा।
केवल कैंसर ही नहीं और भी दवाओं के कीमतों को लेकर सवाल
सुनवाई के दौरान बेंच ने केवल कैंसर की दवाओं तक मामला सीमित नहीं रखा। जस्टिस संदीप मेहता ने कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली एक आम दवा रोसुवास का उदाहरण देते हुए कीमतों में मौजूद अंतर पर सवाल उठाया। अदालत के अनुसार, रोसुवास की एक स्ट्रिप की कीमत करीब 214 रुपये है, क्योंकि वह DPCO के तहत नियंत्रित अनुसूचित दवाओं में शामिल नहीं है। वहीं, यदि रोसुवास में एस्पिरिन का संयोजन हो, तो वह अनुसूचित दवाओं की श्रेणी में आती है और उसकी कीमत करीब 70 रुपए बताई गई। अदालत ने सवाल किया कि जब किसी दवा में एक अतिरिक्त घटक जुड़ता है तो उसकी कीमत अधिक होनी चाहिए, लेकिन यहां उलटा अंतर दिखाई दे रहा है।
सिर्फ कंपनी पर जिम्मेदारी डालने पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान इंडियन फार्मास्यूटिकल अलायंस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि MRP और रिटेल कीमत के बीच दिखाई देने वाला बड़ा अंतर जरूरी नहीं कि पूरा मुनाफा दवा कंपनियों के पास ही जाता हो। उन्होंने अदालत से यह भी देखने का आग्रह किया कि दवा कंपनियां अपनी दवाएं स्टॉकिस्ट और रिटेलर को किस कीमत पर बेचती हैं। यानी कीमत की पूरी शृंखला निर्माता से स्टॉकिस्ट और फिर रिटेलर तक की जांच की जरूरत बताई गई।
मेडिकल डिवाइस की कीमतों पर भी नियंत्रण जरूरी
याचिका में सिर्फ दवाओं की कीमत नियंत्रित करने की मांग नहीं है। इसमें मेडिकल डिवाइस के दाम पर भी सीमा तय करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं ने मेडिकल उपकरणों में भी खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत के बीच बड़े अंतर का मुद्दा उठाया है। साथ ही डॉक्टरों द्वारा जेनेरिक नाम से दवाएं लिखने की व्यवस्था को अनिवार्य बनाने की मांग भी अदालत के सामने है। इस पर सुनवाई के दौरान दवाओं की गुणवत्ता, निर्माता के चयन और मरीज के हित से जुड़े सवाल भी उठाए गए।
सरकार की दलील- सस्ती दवाओं के लिए तैयार
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि सरकार सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में सुधार की जरूरत होगी तो सरकार उस पर विचार करने के लिए तैयार है। उन्होंने प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि योजना का भी उल्लेख किया, जिसके जरिए कम कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है। हालांकि अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि जो जरूरी दवाएं जनऔषधि केंद्रों पर उपलब्ध नहीं हैं, उन्हें खरीदने वाले मरीजों के पास क्या विकल्प रह जाता है।
अब 29 सितंबर को फिर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई के लिए 29 सितंबर की तारीख तय की है। उस दिन दवा कंपनियों, केंद्र सरकार और अन्य पक्षों की दलीलों पर आगे सुनवाई होगी। मामले का मुख्य सवाल यह है कि जीवनरक्षक और जरूरी दवाओं की कीमत तय करने की मौजूदा व्यवस्था में निर्माता की कीमत, स्टॉकिस्ट की कीमत, रिटेलर की खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली MRP के बीच इतना बड़ा अंतर कैसे बनता है और इसे नियंत्रित करने के लिए मौजूदा नियम कितने प्रभावी हैं।

