क्या 'घोटाला' है एग्जिट पोल? बंगाल का नतीजा जारी न करने पर घिरी AXIS-माय इंडिया

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4 मई के दिन पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों के चुनाव परिणाम घोषित होने वाले हैं। उससे पहले कई पोलिंग एजेंसियों ने अपने एग्जिट पोल के नतीजे जारी किए हैं। अधिकांश एग्जिट पोल असम और पुडुचेरी में भाजपा, केरल में कांग्रेस और तमिलनाडु में डीएमके की सरकार बनने की बात करते हैं। कई एजेंसियां पश्चिम बंगाल में भी भाजपा की सरकार बनने की बात करती हैं। लेकिन एक्सिस माय इंडिया जैसी प्रतिष्ठित एजेंसी, जिसका सफलता दर लगभग 80 प्रतिशत है, उसने बंगाल का डेटा जारी करने से इनकार कर दिया है। एक्सिस के इस निर्णय के बाद ऐसी सभी एजेंसियों पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह कोई बड़ा घोटाला तो नहीं।

दूसरी एजेंसियों ने जहां 29 तारीख को शाम 7 बजे से पहले ही पोल जारी करना शुरू कर दिया, वहीं एक्सिस ने कहा कि वे एक दिन बाद जारी करेंगे। फिर अगले दिन घोषणा की कि वे डेटा जारी नहीं करेंगे क्योंकि लगभग 70 प्रतिशत मतदाताओं ने उन्हें जवाब देने से इनकार कर दिया है। अब सवाल यह उठता है कि अगर इतनी बड़ी एजेंसी, जिसका सफलता दर 80 प्रतिशत है, बंगाल के पोल जारी करने से डर रही है, तो क्या बाकी एजेंसियों का डेटा गलत है। अगर लोगों ने एक्सिस से बात करने से इनकार कर दिया, तो दूसरी एजेंसियों ने डेटा कैसे लिया होगा। इस बारे में एक्सिस के मालिक प्रदीप गुप्ता कहते हैं कि हम मतदाताओं से आमने-सामने जाकर पूछते हैं, जबकि दूसरी एजेंसियां फोन या ईमेल से पूछती हैं। अब सवाल यह है कि अगर लोग आमने-सामने बात करने से मना कर देते हैं, तो क्या वे फोन पर जवाब देते होंगे… इस घटना के बाद एग्जिट या ओपिनियन पोल करने वाली एजेंसियों पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है। क्या वे लोगों को मूर्ख बना रही हैं।

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भारत में एग्जिट पोल की शुरुआत की बात करें तो एनडीटीवी के प्रणव रॉय, योगेंद्र यादव सहित अन्य लोगों ने इसकी शुरुआत की थी। लेकिन उन्होंने बाद में यह काम बंद कर दिया। सीएसडीएस जैसी प्रतिष्ठित संस्था, जो पहले सीटों की संख्या बताती थी, उसने भी केवल वोट प्रतिशत देना शुरू कर दिया। इसका कारण यह था कि भारत में एग्जिट पोल करना बहुत कठिन है। लोगों में इतनी विविधता है कि गलत होने की संभावना ज्यादा रहती है। फिर नई एजेंसियां बाजार में आईं। इन एजेंसियों ने सटीक आंकड़े देने के बजाय रेंज देना शुरू किया। यह रेंज भी बहुत बड़ी होती है। पहले एजेंसियां यह भी बताती थीं कि कितने मतदाताओं पर सर्वे हुआ, किस प्रकार के मतदाता थे, सर्वे कितने समय चला, कितने सवाल पूछे गए,हर तरह की जानकारी देती थीं, लेकिन अब केवल सीटों के आंकड़े दिए जाते हैं। पहले कई न्यूज चैनल एग्जिट पोल करवाते थे, लेकिन उन्होंने भी धीरे-धीरे बंद कर दिया। फिलहाल बंगाल में तो किसी भी राष्ट्रीय न्यूज चैनल ने एग्जिट पोल एजेंसी नहीं रखी है। बाजार में आई नई एजेंसियां अब न्यूज चैनलों को खुद ही मुफ्त में आंकड़े देती हैं और चैनल उन्हें प्रसारित करते हैं। अब हम समझ सकते हैं कि कई एजेंसियां खुद ही पोल कर रही हैं।

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अब सवाल यह है कि किसी भी एग्जिट या ओपिनियन पोल के लिए प्रति व्यक्ति 200 से 300 रुपये खर्च होते हैं। कम से कम 10,000 लोगों का सर्वे करें तो भी 20 से 30 लाख रुपये का खर्च होता है। अब ये एजेंसियां इतना बड़ा खर्च सिर्फ चैनलों को मुफ्त में डेटा देने के लिए तो नहीं करती होंगी, क्योंकि इससे उन्हें कोई मुनाफा नहीं होता। न्यूज एजेंसियां तो विज्ञापन से कमा लेती हैं, लेकिन इन एजेंसियों को क्या फायदा।

जानकारों का कहना है कि अलग-अलग राजनीतिक पार्टियां चुनाव से पहले इन एजेंसियों से अपने लिए सर्वे करवाती हैं। इसमें कुछ गलत भी नहीं है, कोई भी पार्टी मतदाताओं का मूड जानने के लिए ऐसा कर सकती है। लेकिन घोटाला तब शुरू होता है जब ये एजेंसियां पार्टियों के लिए किए गए सर्वे के आंकड़ों में थोड़ा फेरबदल करके उसे एग्जिट पोल के रूप में दिखाती हैं। ये आंकड़े वे न्यूज चैनलों को मुफ्त में देती हैं और चैनल टीआरपी के लिए उन्हें प्रसारित कर देते हैं। लेकिन ये आंकड़े सही नहीं होते, इनमें हेरफेर होता है। वास्तव में एजेंसियां और न्यूज चैनल मिलकर हमें मूर्ख बनाते हैं। इसके अलावा एग्जिट पोल के आंकड़ों का उपयोग राजनीतिक पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं का उत्साह बनाए रखने के लिए भी करती हैं। उदाहरण के लिए, अगर एग्जिट पोल दिखाते हैं कि कोई पार्टी जीत रही है, तो इसका असर कार्यकर्ताओं और मतगणना में लगे सरकारी स्टाफ पर भी पड़ता है। वे मतगणना के दौरान जीतने वाली पार्टी के प्रति नरम रवैया अपनाने लगते हैं। अगर जीतने वाली पार्टी को कुछ वोट कम पड़ रहे हों, तो सरकारी स्टाफ किसी न किसी तरीके से मदद भी कर देता है। एग्जिट पोल का एक और उपयोग सट्टेबाज करते हैं। इसके अलावा शेयर बाजार में खेल करने वाले लोग भी इन आंकड़ों का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह भारत में एग्जिट पोल एक घोटाला बन गया है।

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तो क्या एग्जिट पोल नहीं होने चाहिए? वास्तव में एग्जिट पोल आंकड़ों पर आधारित एक विज्ञान है और इसके कुछ नियम भी होते हैं। लेकिन भारत में ऐसी स्थिति है कि सर्वे करने वाली एजेंसियों पर नजर रखने वाली कोई संस्था नहीं है। अगर कोई गलत तरीके से सर्वे करे या गलत आंकड़े जारी करे, तो उसे रोका नहीं जा सकता। अब मांग उठ रही है कि सभी एजेंसियों को अपने सभी आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। वे कौन-सी पद्धति अपनाते हैं, यह बताना चाहिए। सभी को मिलकर एक एसओपी बनानी चाहिए, ताकि जनता को मूर्ख बनाए जाने से रोका जा सके।

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