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बंगाल में सत्ता बदलाव की आहट: क्या ममता बनर्जी का किला ढहाने में भाजपा इस बार कामयाब हो जाएगी?
एग्जिट पोल में भाजपा को बहुमत क्या इशारा कर रहे हैं
कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के एग्जिट पोल संकेत दे रहे हैं कि राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव है। यानी इस बार संभव है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का किला ढह जाए। दरअसल, अधिकांश सर्वे भाजपा को बहुमत के करीब या उससे आगे दिखा रहे हैं। अंतिम नतीजे 4 मई को आएंगे, लेकिन चुनावी रणनीतियों और सामाजिक समीकरणों के आधार पर यह साफ है कि इस बार मुकाबला केवल सीटों का नहीं, बल्कि नैरेटिव और पहचान की राजनीति का भी रहा है।
बता दें कि ने 2016 में महज 3 सीटों से 2021 में 77 सीटों तक का सफर तय किया था। इस बार पार्टी ने उसी विस्तार को निर्णायक जीत में बदलने के लिए कई स्तरों पर काम किया- खासतौर पर हिंदू वोट, महिला वोटर्स और युवा वर्ग को केंद्र में रखकर।
भाजपा का ‘फिश पॉलिटिक्स’ के जरिए सांस्कृतिक संतुलन साधने की कोशिश
चुनाव के दौरान मछली को लेकर शुरू हुई बहस सांस्कृतिक पहचान से जुड़ गई। तृणमूल कांग्रेस ने आरोप लगाया कि भाजपा ‘शाकाहारी संस्कृति’ थोपना चाहती है, जिससे बंगाली खान-पान और पहचान प्रभावित होगी। इसके जवाब में भाजपा ने अपनी रणनीति बदली और खुद को ‘शाक्त परंपरा’ के करीब दिखाया। पार्टी नेताओं और उम्मीदवारों ने सार्वजनिक रूप से मछली खाकर यह संदेश देने की कोशिश की कि उनका हिंदुत्व स्थानीय परंपराओं के खिलाफ नहीं, बल्कि उनके अनुरूप है। ‘माछ-भात’ को सांस्कृतिक अधिकार के रूप में पेश कर भाजपा ने यह संकेत दिया कि वह बंगाल की सामाजिक बनावट को समझते हुए राजनीति कर रही है।
जय श्रीराम के बदले जय मां काली के नारों पर जोर
चुनाव प्रचार के दौरान धार्मिक पहचान भी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरी। एक वायरल वीडियो के बाद भाजपा ने इसे ‘काली बनाम काबा’ के नैरेटिव में बदल दिया। पार्टी नेताओं ने यह संदेश देने की कोशिश की कि बंगाल की सांस्कृतिक और धार्मिक आत्मा देवी परंपरा से जुड़ी है। दिलचस्प बात यह रही कि भाजपा ने इस बार ‘जय श्री राम’ की बजाय ‘जय मां काली’ जैसे नारों पर अधिक जोर दिया। यह बदलाव रणनीतिक था, जिसका उद्देश्य स्थानीय धार्मिक भावनाओं के साथ तालमेल बैठाना था। इससे पार्टी ने खुद को ‘बाहरी’ छवि से निकालकर ‘स्थानीय’ रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की।
भाजपा का महिला वोट बैंक में सेंध की कोशिश
ममता बनर्जी की राजनीति में महिला वोटर्स की भूमिका बेहद अहम रही है। ‘लक्ष्मीर भंडार’ जैसी योजनाओं ने इस वर्ग को मजबूती से टीएमसी के साथ जोड़े रखा। लेकिन भाजपा ने इस समीकरण को चुनौती देने के लिए आक्रामक रणनीति अपनाई। पार्टी ने महिलाओं को हर महीने 3 हजार रुपये देने, मुफ्त बस यात्रा और सरकारी नौकरियों में 33% आरक्षण का वादा किया। यह सीधे तौर पर आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण का संदेश था। साथ ही महिला आरक्षण के मुद्दे को भी चुनावी मंचों पर प्रमुखता से उठाया गया, जिससे भाजपा ने खुद को महिला हितैषी पार्टी के रूप में स्थापित करने की कोशिश की।
महिला सुरक्षा का मुद्दा भी पीएम मोदी ने जोरशोर से उठाया
महिला सुरक्षा को लेकर भी भाजपा ने आक्रामक रुख अपनाया। प्रधानमंत्री के भाषणों में यह मुद्दा प्रमुखता से उभरा, जिसमें महिलाओं की स्वतंत्रता और सुरक्षा को जोड़कर पेश किया गया। संदेशखाली और आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसी घटनाओं ने राज्य सरकार की छवि पर असर डाला। भाजपा ने इन मुद्दों को केवल विरोध तक सीमित नहीं रखा, बल्कि संबंधित मामलों से जुड़े चेहरों को चुनावी मैदान में उतारकर इसे राजनीतिक रूप दिया। इससे पार्टी ने भावनात्मक और प्रतीकात्मक दोनों स्तरों पर प्रभाव डालने की कोशिश की।
भाजपा की सबसे बड़ी रणनीति- एसआईआर
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) चुनाव का सबसे विवादास्पद लेकिन प्रभावी पहलू रहा। करीब 91 लाख वोटर्स के नाम सूची से हटने के बाद कुल मतदाताओं की संख्या में 11.8% की कमी आई। विश्लेषकों का मानना है कि जिन जिलों में सबसे ज्यादा नाम हटे, वे पारंपरिक रूप से टीएमसी के मजबूत गढ़ रहे हैं। भाजपा ने इसे ‘घुसपैठियों की सफाई’ के रूप में पेश किया, जबकि विपक्ष ने इसे मतदाता दमन बताया। चूंकि पिछली बार कई सीटों पर जीत का अंतर बेहद कम था, ऐसे में वोटर लिस्ट में यह बदलाव निर्णायक साबित हो सकता है।
सबसे बड़ा फैक्टर: एंटी-इनकम्बेंसी और युवा
लगातार 15 साल से सत्ता में रहने के कारण टीएमसी को एंटी-इनकम्बेंसी का सामना करना पड़ रहा है। भ्रष्टाचार के आरोप और टिकट वितरण में बड़े बदलाव के बावजूद पार्टी पर सवाल बने हुए हैं। दूसरी ओर, युवा मतदाता इस बार अहम भूमिका में दिख रहा है। यह वर्ग पारंपरिक कल्याणकारी योजनाओं से आगे बढ़कर रोजगार और औद्योगिक विकास जैसे मुद्दों पर ध्यान दे रहा है। भाजपा ने ‘डबल इंजन सरकार’ और ‘सोनार बांग्ला’ के विजन के जरिए इसी वर्ग को आकर्षित करने की कोशिश की है।
अंतिम फैसला आखिरकार मतदाता ही करेंगे
पश्चिम बंगाल का यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की संभावना नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीतियों की परीक्षा भी है। भाजपा ने सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक और प्रशासनिक हर स्तर पर बहुआयामी दांव खेले हैं। अब देखना यह है कि क्या ये रणनीतियां 15 साल पुराने सत्ता ढांचे को बदल पाती हैं या टीएमसी अपनी पकड़ बनाए रखने में सफल रहती है। अंतिम फैसला मतदाताओं के हाथ में है, लेकिन संकेत यह जरूर हैं कि मुकाबला इस बार पहले से कहीं ज्यादा जटिल और दिलचस्प हो चुका है।

