आषाढ़ मास शुरू: कब से लगेगा मांगलिक कार्यों पर ब्रेक, यह चार महीने तक क्यों रहता है? जानिए इसके पीछे मुख्य कारण क्या है?

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आषाढ़ मास की शुरुआत हो चुकी है। इसी माह से चातुर्मास की शुरुआत भी हो जाएगी। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से इसकी शुरुआत होती है। यह 25 जुलाई को है। इसके बाद से मांगलिक कार्यों पर ब्रेक लग जाएगा। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन से भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और देवउठनी एकादशी तक विश्राम करते हैं। इसलिए हिंदू धर्म में इन चार महीनों को पूजा-पाठ, जप, तप, व्रत, सत्संग और आत्मचिंतन का सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है। इसलिए चातुर्मास की अवधि में विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन, सगाई और अन्य मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। चातुर्मास 25 जुलाई से शुरू होकर 20 नवंबर तक रहेगा। 

वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी तिथि 24 जुलाई को सुबह 9:12 बजे से प्रारंभ होकर 25 जुलाई को सुबह 11:34 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी मनाई जाएगी और इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ होगा। चार माह बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागरण के साथ चातुर्मास का समापन होगा। इस वर्ष देवउठनी एकादशी 20 नवंबर को है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। उनके विश्राम काल के दौरान देवी-देवताओं की सक्रियता भी कम मानी जाती है। इसलिए इस अवधि में नए शुभ और मांगलिक कार्यों को टालने की परंपरा है। देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागने के बाद ही विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञोपवीत, मुंडन और अन्य शुभ संस्कारों के लिए फिर से शुभ मुहूर्त शुरू होते हैं।

चातुर्मास आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना का भी पर्व

चातुर्मास केवल धार्मिक नियमों का समय नहीं, बल्कि आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना का भी पर्व माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु नियमित पूजा, मंत्र जाप, कथा श्रवण, दान-पुण्य और सेवा कार्यों में अधिक समय देते हैं। कई लोग चार महीने तक किसी एक भोजन का त्याग, उपवास या विशेष नियम का पालन करते हैं। संत-महात्मा भी इस अवधि में एक ही स्थान पर रहकर प्रवचन, सत्संग और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। प्राचीन समय में वर्षा ऋतु के कारण यात्रा कठिन होती थी, इसलिए साधु-संत एक स्थान पर ठहरकर लोगों को धर्म और अध्यात्म का संदेश देते थे। यही परंपरा आज भी चातुर्मास के रूप में निभाई जाती है।

देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की विशेष पूजा

देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष पूजा का विधान है। श्रद्धालु व्रत रखते हैं और भगवान को पीले वस्त्र, तुलसी दल, पंचामृत तथा मौसमी फल अर्पित करते हैं। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। शाम के समय तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाने और विष्णु सहस्रनाम या विष्णु मंत्र का जाप करने का भी विशेष महत्व बताया गया है।

चातुर्मास यानी जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का अवसर

धर्मशास्त्रों में चातुर्मास को मन और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का अवसर माना गया है। इस दौरान क्रोध, लोभ और अहंकार जैसी बुराइयों से दूर रहने, सात्विक भोजन करने, संयमित जीवन अपनाने और अधिक से अधिक समय ईश्वर भक्ति में लगाने की सलाह दी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इन चार महीनों में किए गए जप, तप, दान और सेवा का फल सामान्य दिनों की तुलना में अधिक प्राप्त होता है।

देवउठनी एकादशी पर होगा चातुर्मास का समापन

चातुर्मास का समापन देवउठनी एकादशी पर होता है। इस दिन भगवान विष्णु के जागरण के साथ ही मंदिरों और घरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद विवाह सहित सभी मांगलिक कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त फिर से शुरू हो जाते हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्म में चातुर्मास को केवल चार महीनों का धार्मिक काल नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, सेवा और भक्ति का विशेष पर्व माना जाता है।

भक्ति और ध्यान का महीना है आषाढ़ मास

चातुर्मास की शुरुआत आषाढ़ मास में होती है, जिसे भक्ति और ध्यान का महीना माना जाता है। वर्षा ऋतु के आगमन के साथ प्रकृति में नई ऊर्जा का संचार होता है और धार्मिक दृष्टि से भी यह समय साधना के लिए अनुकूल माना जाता है। इसी महीने में योगिनी एकादशी, गुप्त नवरात्रि, देवशयनी एकादशी और गुरु पूर्णिमा जैसे महत्वपूर्ण पर्व आते हैं।

आषाढ़ पूर्णिमा का विशेष महत्व क्यों हैं? जानिए

आषाढ़ पूर्णिमा को मनाई जाने वाली गुरु पूर्णिमा इस वर्ष 29 जुलाई को होगी। इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। उन्होंने वेदों का संकलन किया तथा महाभारत और श्रीमद्भागवत जैसे महान ग्रंथों की रचना की। इस अवसर पर गुरु, शिक्षक और जीवन में मार्गदर्शन देने वाले व्यक्तियों का सम्मान किया जाता है। आश्रमों, मंदिरों और धार्मिक संस्थानों में विशेष पूजा, सत्संग और भंडारों का आयोजन होता है।

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