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पश्चिम बंगाल: क्या ममता बनर्जी का 36 साल पुराना रिकॉर्ड फिर होगा ताज़ा? आखिर क्या था 1990 का वो किस्सा जो आज बन गया हथियार?
तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी पर पथराव और अंडे फेंकने की घटना के बाद पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हलचल और तेज हो गई है। TMC इसे राजनीतिक हमला बताते हुए इसे संगठनात्मक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है। ममता बनर्जी खुद अस्पताल गई थीं और इस घटना को गंभीरता से लेते हुए विपक्ष पर हमला बोला था। लेकिन सवाल यह है कि क्या 36 साल पहले हाजरा मोड़ के पास अपनी बुआ ममता बनर्जी पर हुए हमले की तरह अभिषेक भी इस घटना का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने के लिए कर पाएंगे?
दरअसल, 1990 में कांग्रेस की नेता के रूप में आंदोलन कर रहीं युवा ममता बनर्जी पर कोलकाता के हाजरा मोड़ के पास हमला किया गया था। उस घटना ने उन्हें सत्ता के खिलाफ डटकर मुकाबला करने वाली एक बेहद आक्रामक नेता की पहचान दिलाई थी। उस हमले की तस्वीरें आज भी TMC कार्यालय की दीवारों पर इस तरह लगी हैं कि हर किसी की नजर उन पर पड़े। इस हमले के बाद कांग्रेस से समर्थन न मिलने पर ममता अलग हो गईं और तृणमूल कांग्रेस का गठन किया, और आगे का इतिहास सबके सामने है। व्यक्तिगत चोट को राजनीतिक लाभ में बदलने की यह रणनीति ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर का अहम हिस्सा रही है। 2021 के विधानसभा चुनाव में व्हीलचेयर पर प्रचार करना और BJP पर जानलेवा हमले का आरोप लगाना भी उनके लिए प्रभावी साबित हुआ था।

ऐसी खबर है कि शनिवार की घटना के बाद TMC इस बार भी वही फॉर्मूला आजमाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक इसे 1990 जितना आसान नहीं मानते। इसकी वजह भी साफ है...
सत्ता में रहने के बाद संघर्ष की छवि बनाना मुश्किल: कुछ समय पहले तक ममता बनर्जी मुख्यमंत्री थीं और TMC डेढ़ दशक से राज्य की सत्ता में थी। अब विपक्षी नेता की तरह सड़क पर संघर्ष करने वाली छवि बनाना लोगों को विश्वसनीय नहीं लगता।
अभिषेक की छवि अलग है: ममता बनर्जी ने आंदोलनों और जनसंघर्षों के जरिए अपनी पहचान बनाई, जबकि विपक्ष लगातार अभिषेक बनर्जी पर वंशवाद की राजनीति, परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोप लगाता रहा है। इन आरोपों ने उनकी सार्वजनिक छवि को काफी नुकसान पहुंचाया है। उन्हें अक्सर घमंडी व्यक्ति के रूप में देखा जाता है, जिसके कारण 1990 जैसी जनसहानुभूति फिर से हासिल करना चुनौतीपूर्ण लगता है।

राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका है: 1990 में बंगाल की राजनीति कांग्रेस और वाम मोर्चे के बीच द्विध्रुवीय थी। तीसरे विकल्प के लिए जगह थी, जिसका फायदा ममता बनर्जी ने उठाया। 2026 में BJP एक मजबूत राष्ट्रीय पार्टी के रूप में प्रभावशाली मौजूदगी रखती है, जिसके पास संसाधन और संगठन दोनों हैं। वामपंथी दल अब पहले जितने प्रभावशाली नहीं रहे हैं।
ममता बनर्जी अभिषेक बनर्जी को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं। अस्पताल जाकर उन्होंने इस घटना का इस्तेमाल पार्टी के भविष्य के नेतृत्व पर चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए करने की कोशिश की है। INDIA ब्लॉक के समर्थन के साथ वे इस मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाना चाहती हैं। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि अभिषेक, ममता नहीं हैं, और 2026 का बंगाल अब 1990 के बंगाल जैसा बिल्कुल नहीं रहा है।

दूसरी ओर, BJP ने पहले ही इस तुलना को खारिज कर दिया है और इसे TMC की पुरानी चाल बताया है। अब देखना यह है कि बंगाल के लोग इस 'हमले की राजनीति' पर कितना भरोसा करते हैं।

