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मां कुष्मांडा की दिव्य मुस्कान से हुई थी सृष्टि की रचना, जानें चौथे दिन की पौराणिक कथा
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, यह उस समय की बात है जब सृष्टि का कोई अस्तित्व नहीं था। चारों ओर केवल घना अंधकार छाया हुआ था। न दिन था, न रात, न कोई लोक और न ही कोई जीव। हर तरफ केवल शून्यता व्याप्त थी। उस गहन अंधकार के बीच, अचानक एक दिव्य प्रकाश पुंज प्रकट हुआ। वह प्रकाश पुंज धीरे-धीरे एक स्त्री का स्वरूप लेने लगा, जो साक्षात शक्ति स्वरूपा मां कुष्मांडा थीं।
सृष्टि की रचना और मां की मुस्कान
मान्यता है कि मां कुष्मांडा ने अपनी मुस्कान से इस ब्रह्मांड रूपी को उत्पन्न किया था। 'कु' का अर्थ है छोटा, 'उष्मा' का अर्थ है ऊर्जा या ताप, और 'अंड' का अर्थ है ब्रह्मांड। देवी ने अपनी हंसी से ब्रह्मांड में व्याप्त अंधकार को नष्ट किया और सृष्टि की रचना की। इसीलिए उन्हें 'कुष्मांडा' कहा गया। उनके मुस्कुराते ही चारों ओर प्रकाश फैल गया और जड़-चेतन में प्राणों का संचार होने लगा।
मां कुष्मांडा के पास इतनी असीम शक्ति और तेज है कि वे सूर्य लोक के भीतर निवास करती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, केवल मां कुष्मांडा ही ऐसी देवी हैं, जो सूर्य मंडल के भीतर रहने की शक्ति और क्षमता रखती हैं। उनका तेज सूर्य के समान ही देदीप्यमान है। उनकी आभा से ही दसों दिशाएं आलोकित होती हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में जो तेज मौजूद है, वह मां कुष्मांडा की ही छाया है।
त्रिदेवी की उत्पत्ति
सृष्टि के संचालन के लिए मां कुष्मांडा ने तीन अन्य देवियों को उत्पन्न किया। उन्होंने अपने बाएं हाथ के अंगूठे से 'महाकाली', माथे के तेज से 'महालक्ष्मी' और दाएं हाथ के अंगूठे से 'महासरस्वती' को प्रकट किया। इसके पश्चात इन देवियों ने आगे चलकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा उनकी शक्तियों की रचना की। इस प्रकार मां कुष्मांडा को सृष्टि की 'आदि-शक्ति' माना जाता है।
मां कुष्मांडा की आठ भुजाएं हैं, इसलिए उन्हें 'अष्टभुजा देवी' भी कहा जाता है। उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृत कलश, चक्र, गदा और सभी सिद्धियों व निधियों को देने वाली जप माला है। वे सिंह (शेर) पर सवार हैं, जो शौर्य और साहस का प्रतीक है।

