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राजनीति में खत्म होती भाषा की मर्यादा, क्या सियासत में भी ‘स्वच्छता अभियान’ की जरूरत है…
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का पीएम मोदी के पिता पर अपमानजनक टिप्पणी के बाद बवाल मचा हुआ है
नई दिल्ली। लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव कोई नई बात नहीं है। सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना, फैसलों का विरोध करना और चुनावी मंचों से एक-दूसरे को चुनौती देना राजनीति का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन जब विचारों की लड़ाई व्यक्तिगत टिप्पणियों और परिवार को निशाना बनाने वाली भाषा में बदलने लगे, तो सवाल केवल किसी एक नेता के बयान का नहीं रह जाता, बल्कि पूरी राजनीतिक संस्कृति का बन जाता है। बिहार की राजधानी पटना में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिवंगत पिता को लेकर की गई टिप्पणी ने एक बार फिर इसी गिरती भाषाई मर्यादा को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
क्या बोला था मल्लिकार्जुन खड़गे ने
पटना में एक कार्यक्रम में राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे बापू सभागार में मोदी सरकार और उनकी नीतियों पर बोल रहे थे। तभी कांग्रेस का एक कार्यकर्ता उठकर बोला कि मोदी जी नहीं जाने वाले हैं। जब तक देश में विद्रोह नहीं होगा, मोदी सरकार नहीं हटेगी। इस पर खड़गे ने गुस्सा होकर कहा कि, मोदी क्या उसका बाप भी जाएगा। यह बात उन्होंने 3 बार दोहराई।
राजनीति में इस्तेमाल होने वाले शब्द व्यक्तिगत होते जा रहे हैं
खड़गे के बयान के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे सारी मर्यादाएं तार-तार करने वाला बयान बताया। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और पार्टी के अन्य नेताओं ने भी इसे राजनीतिक शिष्टाचार के खिलाफ करार दिया। हालांकि इस विवाद का व्यापक पहलू यह है कि राजनीतिक मंचों पर असहमति जताने के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द लगातार कठोर और व्यक्तिगत होते जा रहे हैं।
संयम और जिम्मेदारी की अपेक्षा किसी से एक नहीं कर सकते
यह घटना इस सवाल को भी सामने लाती है कि राजनीतिक विरोध जताते समय नेताओं के शब्दों का असर कितना व्यापक होता है। सार्वजनिक मंच से कही गई बात केवल विरोधी दल तक सीमित नहीं रहती। वह कार्यकर्ताओं और समर्थकों के व्यवहार को भी प्रभावित कर सकती है। इसलिए शीर्ष नेताओं की भाषा से संयम और जिम्मेदारी की अपेक्षा स्वाभाविक है।
भाजपा के किस नेता ने खड़गे के बयान पर क्या कहा
कभी मोदी की मां तो कभी पिता पर टिप्पणी: शाह
खड़गे के बयान पर अमित शाह ने एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री के पिता के बारे में अभद्र टिप्पणी कर सारी मर्यादाएं तोड़ दी हैं। शाह ने आरोप लगाया कि कांग्रेस पहले भी प्रधानमंत्री और उनके परिवार को निशाना बनाती रही है। उन्होंने प्रधानमंत्री की मां के संबंध में कथित अभद्र टिप्पणियों, उन्हें 'मौत का सौदागर' कहे जाने और 'चायवाला' कहकर उनकी पृष्ठभूमि का उपहास उड़ाने का उल्लेख किया। शाह ने राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पर अभद्रता की सीमाएं पार करने का आरोप लगाते हुए कहा कि लगातार चुनावी हार से पार्टी हताश है और उसके पास गाली-गलौज की राजनीति के अलावा कुछ नहीं बचा है।
कांग्रेस का वैचारिक दिवालियापन: नितिन नवीन
भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने खड़गे की टिप्पणी को कांग्रेस का वैचारिक दिवालियापन बताया। उनके अनुसार, राजनीतिक विरोध की भी गरिमा होती है और दिवंगत परिजनों को सार्वजनिक भाषणों में घसीटना विपक्ष की सोच को दर्शाता है।
शीर्ष नेतृत्व ही भाषा की मर्यादा भूल रहा: राजनाथ सिंह
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी बयान पर आहत और स्तब्ध होने की बात कही। उन्होंने कहा कि जब किसी दल का शीर्ष नेतृत्व ही भाषा की मर्यादा भूल जाए, तो उसके कार्यकर्ताओं से शालीनता की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
राजनीति में भाषा का स्तर क्यों अहम है?
लोकतंत्र में किसी नेता के विचारों से असहमति रखने का अधिकार सभी को है। सरकार के कामकाज की आलोचना की जा सकती है, प्रधानमंत्री के फैसलों पर सवाल उठाए जा सकते हैं और विपक्ष की नीतियों को कठघरे में खड़ा किया जा सकता है। लेकिन आलोचना और व्यक्तिगत अपमान के बीच एक स्पष्ट अंतर है। जब बहस नीतियों से हटकर परिवार, निजी पृष्ठभूमि और दिवंगत परिजनों पर केंद्रित हो जाती है, तो मूल मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
राजनीतिक दल अक्सर अपने विरोधियों पर भाषा की मर्यादा तोड़ने का आरोप लगाते हैं। लेकिन सार्वजनिक जीवन में शालीनता की कसौटी दल के हिसाब से नहीं बदल सकती। किसी भी नेता के लिए जरूरी है कि वह अपने शब्दों की जिम्मेदारी ले। तीखी आलोचना के लिए अपमानजनक भाषा अनिवार्य नहीं है। मजबूत राजनीतिक तर्क अपनी बात कहने के लिए व्यक्तिगत हमलों का सहारा नहीं मांगते।
सियासत को फिर तलाशना होगा संयम
इस विवाद में दोनों पक्षों के राजनीतिक आरोप अपनी जगह हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि सार्वजनिक जीवन में भाषा की सीमा कौन तय करेगा और उसका पालन कौन करेगा। लोकतंत्र में चुनाव जीतना या विरोधी को घेरना राजनीतिक सफलता का पैमाना हो सकता है, मगर इस तरह की भाषा से खुद को बचाकर रखना भी जरूरी है।
राजनीतिक नेताओं के शब्दों का प्रभाव उनके समर्थकों से आगे समाज तक पहुंचता है। यदि मंचों पर अपमान को सामान्य राजनीतिक हथियार बना दिया जाएगा, तो स्वस्थ बहस और असहमति के लिए जगह लगातार कम होती जाएगी। राजनीति में मतभेद बने रहेंगे, सत्ता और विपक्ष के बीच संघर्ष भी जारी रहेगा, लेकिन इन सबके बीच भाषा का संयम बचाए रखना जरूरी है।

