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अन्य राजनेताओं की तरह ही स्वास्थ्य मंत्री प्रफुल पानसेरिया का भी दांव उल्टा पड़ गया
राजनीति में कई बार एक तस्वीर वर्षों की मेहनत से बनाई गई प्रतिष्ठा पर असहज करने वाले सवाल खड़े कर देती है। सार्वजनिक कार्यक्रमों में नेताओं के साथ खड़े रहने, माला पहनाने या सम्मान प्राप्त करने वाले लोगों की पृष्ठभूमि बाद में विवादास्पद निकलने पर राजनेताओं को सफाई देनी पड़ती है। गुजरात में इस तरह की घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं। अब इस सूची में स्वास्थ्य मंत्री प्रफुल पानसेरिया का नाम चर्चा में आया है।
सूरत में चार अक्टूबर, 2026 को आयोजित ‘वंदे आयुकोन-3’ कार्यक्रम में पानसेरिया के हाथों एक व्यक्ति को ‘आयुर्वेद सेवा रत्न’ पुरस्कार दिया गया। इसके बाद सामने आया कि इस व्यक्ति को पहले नवसारी एसओजी ने कथित फर्जी चिकित्सा प्रैक्टिस के मामले में गिरफ्तार किया था। सम्मान की तस्वीरें वायरल होने पर विवाद खड़ा हो गया। 57 से अधिक आयुर्वेदिक डॉक्टरों ने शिकायत की और आयोजकों ने पुरस्कार वापस ले लिया होने की खबरें हैं। हालांकि पहले हुई गिरफ्तारी का अर्थ अदालत में दोषी ठहराया जाना नहीं है।

लेकिन गुजरात की राजनीति में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है…
दिसंबर 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के साथ रमेश पटेल उर्फ माइकल की तस्वीर चर्चा में आई थी। दमन के इस व्यक्ति को शराब की तस्करी के मामलों में गिरफ्तार किया गया था। इससे पहले अक्टूबर में गांधीनगर के एक कार्यक्रम में उसने मुख्यमंत्री को पुष्पगुच्छ और उपहार दिया था। यह तस्वीर सामने आने पर सवाल उठा था कि ऐसी शख्सियत मुख्यमंत्री तक कैसे पहुंची।
मार्च 2023 में दाहोद जिले के करमडी गांव में जलापूर्ति योजना के सरकारी कार्यक्रम में एक और विवाद खड़ा हुआ। बिल्कीस बानो मामले में अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए शैलेश भट्ट दाहोद के सांसद जसवंतसिंह भाभोर और विधायक शैलेश भाभोर के साथ मंच पर दिखाई दिए। ये तस्वीरें जिला सूचना विभाग द्वारा भी जारी की गई थीं। विधायक ने कहा था कि वह खुद व्यस्त थे, इसलिए मंच पर कौन बैठा था, इस पर उनका ध्यान नहीं गया। यहां मामला केवल आरोपी का नहीं बल्कि अदालत में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सरकारी मंच पर मौजूदगी का था।

उसी साल प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारी के रूप में अपनी पहचान बताकर लोगों को गुमराह करने के आरोप में अहमदाबाद के किरण पटेल को गिरफ्तार किया गया। खबरें आई थीं कि उसने वर्तमान में हमारे देश के गृह मंत्री अमित शाह सहित राजनीतिक नेताओं के साथ अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट की थीं। ऐसी खबरें भी थीं कि उसने इन तस्वीरों का इस्तेमाल अपनी पहचान को प्रभावशाली दिखाने के लिए किया था। हालांकि तस्वीरें अपने आप में किसी राजनीतिक नेता की घोटाले में संलिप्तता साबित नहीं करती थीं।
नवंबर 2024 में BZ ग्रुप के कथित वित्तीय घोटाले के आरोपी भूपेंद्रसिंह झाला की मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल सहित भाजपा नेताओं के साथ तस्वीरें सार्वजनिक हुईं। कांग्रेस ने इन तस्वीरों के आधार पर राजनीतिक निकटता के आरोप लगाए, जबकि भाजपा ने संबंधित आरोपी के पार्टी का पदाधिकारी होने से इनकार किया। जनवरी 2025 में मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने खुद एक पुरस्कार समारोह में आयोजकों को सम्मान पाने वाले व्यक्ति की योग्यता की जांच करने की नसीहत दी थी। यह नसीहत आज के प्रफुल पानसेरिया प्रकरण में विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाती है।

जुलाई 2024 में सूरत में ड्रग्स मामले में गिरफ्तार विकास आहिर की मौजूदा उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री हर्ष संघवी तथा केंद्रीय मंत्री चंद्रकांत पाटिल समेत कई नेताओं के साथ तस्वीरें भी चर्चा में आई थीं। सूरत पुलिस ने जानकारी दी थी कि आहिर के खिलाफ पहले के छह अपराध दर्ज हैं। हालांकि पुलिस कमिश्नर ने बताया था कि जांच में कोई राजनीतिक संबंध सामने नहीं आया। भाजपा ने भी स्पष्ट किया था कि आपराधिक गतिविधियों में शामिल किसी भी व्यक्ति को संरक्षण नहीं दिया जाता।
यह समस्या किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं है। दिसंबर 2024 में सूरत में फर्जी मेडिकल डिग्री के कथित घोटाले में रशेष गुजराती की गिरफ्तारी के बाद यह बात सामने आई कि वह पहले कांग्रेस के डॉक्टर्स सेल के अध्यक्ष रह चुके थे। कांग्रेस ने बताया कि वह कई साल पहले ही पार्टी से अलग हो गए थे और उनकी नियुक्ति के समय उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं था। कांग्रेस ने आरोपी की भाजपा के एक नेता के साथ डॉक्टरों के कार्यक्रम में खिंचवाई गई तस्वीर भी पेश की थी। उसी महीने कच्छ में फर्जी ईडी छापेमारी के मामले में आरोपी अब्दुल सत्तार मांजेती की आम आदमी पार्टी के नेताओं के साथ तस्वीरों को लेकर भी विवाद हुआ। हर्ष संघवी ने आरोपी के पार्टी से जुड़े होने का आरोप लगाया, जबकि ईसुदान गढ़वी और गोपाल इटालिया ने उस दावे को चुनौती दी। इस तरह तस्वीरों के आधार पर राजनीतिक आरोपों और दलीलों की परंपरा विभिन्न पार्टियों में देखने को मिलती है।

इन सभी घटनाओं का अर्थ यह नहीं है कि तस्वीर में दिखाई देने वाले राजनेता को संबंधित अपराध की जानकारी थी या उसमें उनकी संलिप्तता थी। तस्वीर परिचय का सबूत हो सकती है, लेकिन अपराध में भागीदारी का नहीं। दूसरी ओर, जब किसी व्यक्ति को आधिकारिक कार्यक्रम में विशेष सम्मान दिया जाता है, तो आयोजकों की जांच-पड़ताल की जिम्मेदारी सामान्य फोटोग्राफ की तुलना में अधिक होती है।
प्रफुल पानसेरिया ने स्पष्ट किया है कि मंत्री हर व्यक्ति को पहचानते हों, यह जरूरी नहीं है और उनके साथ फोटो खिंचवाने से किसी अपराधी को कानूनी संरक्षण नहीं मिलता। यह दलील व्यावहारिक है। लेकिन सम्मान पाने वाले व्यक्ति का मेडिकल रजिस्ट्रेशन, योग्यता और पृष्ठभूमि जांचने का काम किसने किया, इस सवाल का जवाब भी जरूरी है।
राजनीतिक मंचों पर नेताओं की मौजूदगी आयोजकों के लिए प्रतिष्ठा का विषय होती है। कुछ लोगों के लिए यही मौजूदगी अपनी सामाजिक विश्वसनीयता बढ़ाने का साधन बन सकती है। इसलिए सार्वजनिक समारोहों की व्यवस्था में आमंत्रित व्यक्ति, सामान्य आगंतुक और सम्मान के लिए चुने गए उम्मीदवार के बीच स्पष्ट अंतर होना जरूरी है।
प्रफुल पानसेरिया के प्रकरण से अब मुख्य सवाल यह नहीं है कि उनके साथ किसने तस्वीर खिंचवाई। सवाल यह है कि सम्मान के लिए सूची किसने तैयार की, उसे किसने मंजूरी दी और जांच में चूक क्यों हुई? राजनीति में तस्वीर खिंचवाने का क्षण शायद कुछ सेकंड का होता है, लेकिन उस तस्वीर के पीछे उठने वाले सवालों का जवाब देने के लिए वर्षों पुराने राजनीतिक उदाहरण फिर सामने आ सकते हैं। इस प्रकरण में भी व्यक्तिगत आरोपों के बजाय आयोजकीय जिम्मेदारी और पारदर्शिता पर ध्यान केंद्रित करना अधिक जरूरी है।

