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समय बदल गया है, सहमति से बने संबंधों पर चरित्र पर सवाल नहीं उठा सकते; जानिए सुप्रीम कोर्ट ने समाज को क्या दिया संदेश?
क्या दो वयस्क अविवाहित व्यक्तियों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों का उपयोग किसी व्यक्ति के चरित्र पर सवाल उठाने के लिए किया जा सकता है? क्या ऐसा संबंध जो विवाह तक नहीं पहुंचता, उसे स्वतः ही धोखाधड़ी माना जा सकता है? सिर्फ एक सरकारी भर्ती विवाद से कहीं आगे जाकर व्यापक प्रभाव डालने वाले एक ऐतिहासिक फैसले में, देश की सर्वोच्च अदालत ने इन दोनों प्रश्नों का उत्तर दृढ़ता से ‘नहीं’ में दिया है।
ऐसे समय में जब विवाह-पूर्व संबंधों को आज भी समाज में कलंक के रूप में देखा जाता है और अक्सर ऐसे मामले अदालतों तक पहुंचते हैं, देश की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया है कि दो सहमति देने वाले अविवाहित वयस्कों के बीच शारीरिक संबंध अपने आप में किसी के चरित्र का मूल्यांकन करने का आधार नहीं हो सकते। अदालत ने उस मानसिकता के प्रति भी चेतावनी दी है जो केवल संबंध टूट जाने के कारण किसी एक व्यक्ति को दोषी मान लेती है।
‘बार एंड बेंच’ की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा, “दो सहमति देने वाले अविवाहित वयस्कों के बीच शारीरिक संबंध, उस संबंध में शामिल किसी व्यक्ति के चरित्र के बारे में कोई प्रतिकूल या नकारात्मक धारणा बनाने का आधार नहीं हो सकते और न ही होने चाहिए। ऐसा कोई कानून नहीं है जो दो सहमति देने वाले अविवाहित वयस्कों को अपनी पसंद के संबंध रखने से रोकता हो।”
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी तेलंगाना में पुलिस कांस्टेबल के रूप में चयनित गजुला तिरुपति नामक उम्मीदवार के मामले की सुनवाई के दौरान आई। तिरुपति का चयन एक आपराधिक मामले के कारण रद्द कर दिया गया था, जो एक दशक से अधिक पहले उसकी पड़ोस में रहने वाली एक महिला के साथ संबंधों से उत्पन्न हुआ था।
लेकिन अदालत का यह फैसला केवल यह तय करने तक सीमित नहीं रहा कि कोई उम्मीदवार सरकारी नौकरी के लिए योग्य है या नहीं।
पीठ ने एक ऐसे प्रश्न पर विचार किया जो आज कानून, समाज और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के केंद्र में है: क्या वयस्कों को ऐसे सहमति-आधारित संबंधों के लिए दंडित किया जाना चाहिए जो विवाह में परिणत नहीं हुए?
‘बार एंड बेंच’ द्वारा उद्धृत फैसले के अनुसार, अदालत ने कहा, “हर संबंध विवाह में परिणत नहीं होता। इसलिए केवल इस आधार पर कि संबंध विवाह तक नहीं पहुंचा, यह मानने का कोई कारण नहीं है कि एक पक्ष ने दूसरे पक्ष के साथ धोखाधड़ी की है।”
अदालत ने स्वीकार किया कि सामाजिक वास्तविकताएं बदल रही हैं और अधिकारियों को लोगों के आचरण का मूल्यांकन करते समय इन परिवर्तनों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। पीठ के अनुसार, विवाह-पूर्व संबंध समकालीन समाज की वास्तविकता हैं और संस्थानों को अतीत की रूढ़िवादी धारणाओं पर निर्भर रहने के बजाय बदलते समय के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।
फैसले के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक में न्यायाधीशों ने कहा कि जब दो वयस्क लंबे समय तक संबंध में रहते हैं, तो यह माना जाएगा कि वह संबंध वैध सहमति (Valid Consent) पर आधारित था। पीठ ने कहा, “इसके अलावा, जहां ऐसा संबंध लंबे समय तक, जैसे कुछ वर्षों तक चला हो, वहां इस न्यायालय ने बार-बार एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष के विरुद्ध दायर उन आपराधिक मामलों को रद्द किया है जिनमें आरोप लगाया गया था कि पीड़िता को विवाह का झूठा वादा करके शारीरिक संबंध बनाए गए। क्योंकि ऐसे मामलों में यह माना जाएगा कि संबंध दोनों की वैध सहमति पर आधारित था।”
तिरुपति का चयन अस्थायी रूप से स्टाइपेंडरी कैडेट ट्रेनी पुलिस कांस्टेबल के पद के लिए किया गया था। आवेदन करते समय उसने स्वयं खुलासा किया था कि वर्ष 2014 में उसके खिलाफ एक आपराधिक मामला दर्ज हुआ था।
यह मामला उसकी पड़ोस में रहने वाली एक महिला के साथ संबंधों से उत्पन्न हुआ था। हालांकि, दोनों पक्षों के बीच समझौता हो जाने के बाद 2015 में लोक अदालत के समक्ष यह मामला सुलझ गया था और अंततः आईपीसी की धारा 376 (बलात्कार) के तहत कोई आरोप आगे नहीं बढ़ाया गया।फिर भी, तेलंगाना स्टेट लेवल पुलिस रिक्रूटमेंट बोर्ड ने इस मामले को नैतिक अधःपतन (Moral Turpitude) मानते हुए उसका चयन रद्द कर दिया।
यह विवाद न्यायिक व्यवस्था के विभिन्न स्तरों से होकर गुजरा। तेलंगाना हाई कोर्ट के एकल न्यायाधीश ने दो बार उसके पक्ष में निर्णय दिया था, लेकिन बाद में डिवीजन बेंच ने उन निर्णयों को पलट दिया, जिसके बाद तिरुपति ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी चर्चा की।
पीठ ने कहा कि लोक अदालत के समक्ष हुआ समझौता स्वतः ही अपराध स्वीकार करने के समान नहीं माना जा सकता। साथ ही, कोई नियोक्ता (Employer) केवल इस आधार पर कदाचार की धारणा नहीं बना सकता कि कोई आपराधिक मामला समझौते के साथ समाप्त हुआ था।
न्यायाधीशों ने कहा कि यदि ऐसे साक्ष्य होते कि शिकायतकर्ता महिला को धमकाया गया था, उस पर दबाव डाला गया था या उसे समझौते के लिए मजबूर किया गया था, तो अधिकारी उम्मीदवार की उपयुक्तता की जांच करने के हकदार होते। हालांकि, वर्तमान मामले में ऐसा कोई सामग्री या साक्ष्य उपलब्ध नहीं था।
अदालत ने विशेष रूप से उन प्रयासों की कड़ी आलोचना की जिनमें कभी कानूनी रूप से सिद्ध न हुई बातों के आधार पर मनमाने निष्कर्ष निकाले गए।
अदालत ने कहा, “क्या शिकायतकर्ता महिला को संबंध बनाने के लिए धोखा दिया गया था या नहीं, यह केवल वही बता सकती थी। आम जनता यह नहीं कह सकती कि अपीलकर्ता ने उसके साथ धोखाधड़ी की थी या नहीं। ऐसी परिस्थितियों में, जब शिकायतकर्ता ने स्वयं मामले को आगे न बढ़ाने का निर्णय लिया और कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि मामले में समझौता करने के लिए अपनी सहमति दी, तब अधिकारियों के लिए कोई गलत निष्कर्ष निकालने और अपीलकर्ता के चरित्र के बारे में प्रतिकूल अनुमान लगाने का कोई आधार नहीं था।”
इस फैसले का महत्व केवल एक पुलिस उम्मीदवार को मिली राहत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक संदेश में निहित है। वर्षों से, असफल संबंधों से उत्पन्न आरोप अक्सर ऐसे सामाजिक परिणाम लेकर आते रहे हैं जो अदालत की कार्यवाही समाप्त होने के बाद भी व्यक्ति का पीछा नहीं छोड़ते। चरित्र, नैतिकता और रोजगार के लिए उपयुक्तता का मूल्यांकन अक्सर व्यक्तिगत संबंधों के चश्मे से किया जाता रहा है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उस दृष्टिकोण पर एक बड़ा प्रहार है। यह वयस्कों के सहमति-आधारित संबंधों और आपराधिक आचरण के बीच स्पष्ट रेखा खींचता है, साथ ही अधिकारियों को चेतावनी देता है कि वे असफल प्रेम संबंधों को धोखाधड़ी या नैतिक दुराचार के समान न मानें।
तिरुपति की नियुक्ति बहाल करते हुए अदालत ने कहा कि नियोक्ता केवल धारणाओं के आधार पर प्रतिकूल राय नहीं बना सकते। उनके पास अपराध किए जाने के स्पष्ट साक्ष्य और उस अपराध से संबंधित व्यक्ति की संलिप्तता दर्शाने वाली सामग्री होना अनिवार्य है। इस प्रकार, यह फैसला भविष्य में केवल सेवा कानून (Service Law) के एक निर्णय के रूप में ही नहीं, बल्कि आधुनिक भारत में सहमति, व्यक्तिगत स्वायत्तता और संबंधों के बदलते स्वरूप पर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में भी याद किया जाएगा।

