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कोरोना वैक्सीन के बाद अब इबोला की बारी; सीरम इंस्टीट्यूट ने शुरू की वैक्सीन की तैयारी
कोविड-19 महामारी के दौरान कोविशील्ड का उत्पादन करके लाखों लोगों की जान बचाने वाला भारत का सीरम इंस्टीट्यूट अब दुनिया के सामने खड़े दूसरे बड़े खतरे से निपटने की कोशिश कर रहा है। ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं और वैश्विक भागीदारों के साथ मिलकर, सीरम इंस्टीट्यूट इबोला वायरस के नए और घातक स्ट्रेन के लिए वैक्सीन विकसित करने पर काम कर रहा है। ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस वैक्सीन के शुरुआती चरण का विकास तेजी से आगे बढ़ रहा है। यदि प्री-क्लिनिकल ट्रायल पूरी तरह सफल साबित होते हैं, तो अगले दो से तीन महीनों में क्लिनिकल-ग्रेड वैक्सीन की डोज तैयार हो सकती हैं।
वैश्विक स्तर पर इबोला वायरस रोग (EVD) से पीड़ित मरीजों में मृत्यु दर 25% से 90% तक है। इबोला वायरस पहली बार 1976 में अफ्रीका में सामने आया था। कांगो के जिस क्षेत्र से यह वायरस मिला था, उसके पास बहने वाली इबोला नदी के नाम पर इसका नाम रखा गया था। यह घातक बीमारी संक्रमित व्यक्ति के खून, उल्टी और अन्य शारीरिक तरल पदार्थों के जरिए फैलती है।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ऑक्सफर्ड वैक्सीन ग्रुप में वैक्सीन इम्यूनोलॉजी विभाग की प्रमुख प्रोफेसर टेरेसा लैम्बे ने कहा कि, ‘ऑक्सफर्ड में वैक्सीन के लिए जानवरों पर परीक्षण पहले ही शुरू हो चुके हैं और दुनिया भर की भागीदार संस्थाओं के सहयोग से आगे बढ़ रहे हैं। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया एक ऐसी संस्था है जो बहुत तेजी से और बड़े पैमाने पर काम करने की क्षमता रखती है। हमें उम्मीद है कि क्लिनिकल-ग्रेड वैक्सीन की डोज दो से तीन महीनों में तैयार हो जाएंगी।’
पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) वर्तमान में उत्पादित डोज की संख्या के हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन निर्माता कंपनी है। इसकी स्थापना 1966 में उद्योगपति और वैज्ञानिक डॉ. साइरस पूनावाला द्वारा की गई थी। वर्तमान में इस कंपनी का नेतृत्व उनके बेटे अदार पूनावाला कर रहे हैं। कंपनी कोरोना महामारी के दौरान COVID-19 वैक्सीन कोविशील्ड बनाकर चर्चा में आई थी। सीरम इंस्टीट्यूट ओरी, डिप्थीरिया, टेटनस, पोलियो और हेपेटाइटिस बी सहित विभिन्न प्रकार की जीवनरक्षक वैक्सीन का उत्पादन करता है।
सीरम इंस्टीट्यूट के उत्पादों का उपयोग 170 से अधिक देशों में किया जाता है। इसकी 25 से अधिक वैक्सीन को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से मान्यता मिल चुकी है। यही कारण है कि कंपनी महामारी और संक्रामक रोगों के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में कई देशों और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों के लिए एक प्रमुख भागीदार है।
प्रोफेसर लैम्बे के अनुसार, यह वैक्सीन ChAdOx प्लेटफॉर्म पर आधारित है। यह एडेनोवायरल वेक्टर तकनीक ऑक्सफर्ड की COVID-19 वैक्सीन में भी इस्तेमाल की गई थी। इस प्लेटफॉर्म के कारण वैज्ञानिक वैक्सीन बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सके हैं। इस तकनीक से जुड़े इम्यून रिस्पॉन्स के पहले से मौजूद डेटा ने शुरुआती शोध और उत्पादन तैयारियों को गति देने में मदद की है।
वर्तमान वैक्सीन को सिंगल-डोज वैक्सीन के रूप में विकसित किया जा रहा है। पहले से स्वीकृत इबोला ज़ैरे वैक्सीन भी इसी फॉर्मेट में उपलब्ध है। वैज्ञानिकों का उद्देश्य शरीर में एंटीबॉडी और T सेल दोनों प्रकार की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उत्पन्न करना है। हालांकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के खिलाफ दीर्घकालिक प्रतिरक्षा क्षमता को लेकर व्यापक डेटा अभी उपलब्ध नहीं है।

