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पिता की कैंसर से मौत के बाद सूरत के बेटे ने छोड़ी रासायनिक खेती, प्राकृतिक खेती से बन गए मिसाल
आज के समय में कैंसर जैसी बीमारियों के पीछे रासायनिक खाद और खाने में पहुंचने वाले जहरीले तत्वों को भी एक बड़ा कारण माना जाता है। हालांकि अभी तक इसका पूरी तरह समाधान नहीं मिल पाया है। देश की बढ़ती आबादी को देखते हुए पूरी तरह रासायनिक खेती बंद करना आसान नहीं है, लेकिन छोटे-छोटे प्रयासों से बदलाव जरूर लाया जा सकता है। सूरत से एक ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जहां पिता की कैंसर से मौत के बाद बेटे ने अपनी खेती में रासायनिक खाद का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया।
यह मामला सूरत जिले के ओलपाड तहसील के सरस गांव के किसान कल्पेश पटेल का है। उन्होंने अपने निजी दुख को समाज के लिए प्रेरणा बना दिया। पिता की कैंसर से मौत के बाद उन्होंने रासायनिक खेती छोड़कर प्राकृतिक खेती अपनाई। आज वह गुजरात के सफल प्राकृतिक किसानों में गिने जाते हैं।

कल्पेश पटेल के पिता रमणभाई पटेल कई वर्षों तक खेतों में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल करते थे। कल्पेश बताते हैं कि उनके पिता के शरीर से हमेशा कीटनाशकों जैसी गंध आती थी। जब उनके पिता को कैंसर हुआ, तब उन्हें एहसास हुआ कि रासायनिक खेती का स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। पिता के निधन के बाद उन्होंने फैसला किया कि अब खेती में जहरीले रसायनों का इस्तेमाल नहीं करेंगे।
साल 2019 में कल्पेश ने अपनी जमीन पर प्राकृतिक खेती का प्रयोग शुरू किया। सूरत की एक निजी कंपनी में केमिकल ऑपरेटर की नौकरी के साथ-साथ उन्होंने गुजरात कृषि विभाग द्वारा आयोजित प्रशिक्षण में हिस्सा लिया और जीवामृत जैसी प्राकृतिक खेती की तकनीकें सीखीं।
आज वह करीब साढ़े तीन बीघा जमीन में 50 से ज्यादा किस्म के केले उगा रहे हैं। इनमें पूवन, रस्ताली, बसराई, लाल केला, इलायची और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय ब्लू जावा जैसी किस्में शामिल हैं। उनके खेत में पैदा होने वाले केले के गुच्छे आमतौर पर 30 किलो से ज्यादा वजन के होते हैं। साल 2025 में उनके खेत में 73 किलो वजन का केले का गुच्छा पैदा हुआ था, जिसने कृषि वैज्ञानिकों और देशभर के किसानों का ध्यान खींचा।

कल्पेश पटेल के मुताबिक प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद वह हर साल प्रति बीघा 15 से 20 हजार रुपये तक की बचत कर रहे हैं। जमीन की गुणवत्ता सुधरने से उत्पादन में भी बड़ा इजाफा हुआ है। फिलहाल वह साढ़े तीन बीघा जमीन से हर साल करीब 10 से 12 लाख रुपये की कमाई कर रहे हैं।
इसके अलावा वह बचे हुए केलों से वेफर्स, बनाना पाउडर और ड्राय बनाना फिग जैसी चीजें भी तैयार करते हैं।
कल्पेश पटेल की यह कहानी समाज के लिए प्रेरणा है। उन्होंने साबित कर दिया कि सिर्फ रासायनिक खाद से ही सफल खेती संभव नहीं है, प्राकृतिक खेती से भी अच्छी कमाई और बेहतर जीवन पाया जा सकता है।
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Dr. Dinky Gajiwala, DNB (Medicine), DNB (Medical Oncology), is a dedicated Medical Oncologist and Consultant at Hope Cancer Clinic, Surat. She specializes in comprehensive cancer treatment and is passionate about empowering patients through education and awareness. With a strong presence on social media, Dr. Gajiwala actively spreads reliable information on breast cancer, chemotherapy, immunotherapy, and other critical aspects of oncology, making cancer care more accessible and understandable for all.

