- Hindi News
- मनोरंजन
- निमंत्रण रद्द होने पर भड़के नसीरुद्दीन शाह, बोले- ‘प्रशंसा न करना अब देशद्रोह बन गया है’
निमंत्रण रद्द होने पर भड़के नसीरुद्दीन शाह, बोले- ‘प्रशंसा न करना अब देशद्रोह बन गया है’
मशहूर फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं। एक अखबार में लिखे अपने लेख में अभिनेता ने कहा कि मुंबई यूनिवर्सिटी द्वारा उनका निमंत्रण रद्द करना उनकी नैतिक ईमानदारी और साहस की कमी को दर्शाता है। उन्होंने लिखा, 'प्रशंसा न करना अब देशद्रोह बन गया है। यह वह देश नहीं रहा जिसमें मैं बड़ा हुआ और जहां मुझे प्यार करना सिखाया गया था। 2 मिनट की नफरत अब 24 घंटे की नफरत बन गई है।'
अपने लेख की शुरुआत करते हुए शाह ने कहा, 'पिछले 40 से अधिक वर्षों में, मेरे काम से जुड़े कुछ सबसे सुखद और शिक्षाप्रद अनुभव छात्रों के साथ ही रहे हैं, विभिन्न संस्थानों में और व्यक्तिगत स्तर पर भी। मैंने उनकी प्रगति में शामिल होने का प्रयास किया है।'
उन्होंने आगे लिखा, 'वर्षों तक छात्रों के एक बड़े वर्ग को समझाने के प्रयास ने मेरी स्वाभाविक धैर्य की कमी को थोड़ा कम किया है। हो सकता है कि इस रास्ते में मैंने कई गलतियाँ की हों, लेकिन मैं बिना किसी संदेह के कह सकता हूँ कि मैंने किसी भी अभिनय शिक्षक की तुलना में छात्रों के साथ काम करके अधिक सीखा है।'
मामले का जिक्र करते हुए वे लिखते हैं कि मुंबई यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग ने 1 फरवरी को ‘जश्न-ए-उर्दू’ कार्यक्रम का आयोजन किया था। उन्हें इस कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था और वे इसके लिए बहुत उत्साहित थे, क्योंकि उन्हें छात्रों के साथ बातचीत करने का मौका मिलने वाला था। लेकिन 31 जनवरी की रात को, बिना किसी ठोस स्पष्टीकरण के, उन्हें बताया गया कि उन्हें अब आने की जरूरत नहीं है। इसके लिए न तो कोई मान्य कारण दिया गया और न ही ढंग से माफी मांगी गई। इसके बाद यूनिवर्सिटी ने कार्यक्रम में घोषणा कर दी कि उन्होंने स्वेच्छा से आने से इनकार कर दिया था, जो कि पूरी तरह से झूठ है।
नसीरुद्दीन शाह ने आगे लिखा कि मुंबई यूनिवर्सिटी के लोगों में यह सच कहने की हिम्मत नहीं थी कि उन्हें इसलिए हटाया गया क्योंकि वे खुलकर अपनी बात रखते हैं। उन्होंने कहा, "यदि कोई ऐसा मानता है, तो उन्हें इसका सबूत देना चाहिए कि मैंने देश के खिलाफ क्या कहा है।
दिग्गज अभिनेता ने अपने लेख में स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी भी खुद को ‘विश्वगुरु’ कहने वालों की प्रशंसा नहीं की है। उन्होंने कहा, "मैंने अक्सर सत्ताधारी सरकार के कई कार्यों की खुलकर आलोचना की है और आगे भी करता रहूंगा। मैंने अक्सर हमारे देश में नागरिक भावना और दूसरों के प्रति सम्मान की कमी पर दुख व्यक्त किया है।"
उन्होंने सवाल उठाया कि जब पाठ्यपुस्तकों की सामग्री बदली जा रही हो, विज्ञान के साथ छेड़छाड़ हो रही हो और मुख्यमंत्री खुलेआम किसी समुदाय को ‘मियां’ कहकर निशाना बना रहे हों, तो ऐसे में चुप रहना कैसे सही हो सकता है?
अपने लेख के अंत में नसीरुद्दीन शाह ने यह प्रश्न भी उठाया है कि 'यह नफरत कब तक चलेगी?' साथ ही उन्होंने लिखा, "यह अब वह देश नहीं रहा जिसमें मैं बड़ा हुआ। क्या इस स्थिति की तुलना जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास ‘1984’ से करना अधिक सटीक होगा, जिसमें ‘महान नेता’ की प्रशंसा न करना देशद्रोह माना जाता है?"

