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सऊदी अरब ने कच्चे तेल की कीमत में 11 डॉलर की कटौती की! क्या पेट्रोल-डीज़ल सस्ता होगा?
दुनिया की सबसे बड़ी तेल निर्यातक सऊदी अरामको ने अगस्त में भारत सहित एशियाई ग्राहकों को आपूर्ति किए जाने वाले कच्चे तेल के आधिकारिक विक्रय मूल्य (OSP) में रिकॉर्ड कटौती की है। कंपनी ने अपने सबसे अधिक बिकने वाले अरब लाइट क्रूड की कीमत क्षेत्रीय ओमान/दुबई बेंचमार्क से 1.50 डॉलर प्रति बैरल कम तय की है। जुलाई की तुलना में यह प्रति बैरल 11 डॉलर की रिकॉर्ड कटौती है।
एक समाचार एजेंसी के अनुसार, 2003 के बाद अब तक के रिकॉर्ड में यह सबसे बड़ी कटौती है। इस कटौती के साथ OSP जून 2020 के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर आ गया है, जब वैश्विक बाजार में कच्चेतेल की भारी भरमार थी और कोविड-19 लॉकडाउन के कारण मांग में गिरावट से कीमतें कई दशकों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई थीं।
सऊदी अरब द्वारा कच्चे तेल को सस्ता किए जाने से भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए कच्चे तेल की खरीद लागत कम हो सकती है। यदि कच्चे तेल के एक बैरल की कीमत में 10 डॉलर की वृद्धि होती है, तो इससे भारतीय ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को प्रति लीटर लगभग 6 रुपये का नुकसान होता है।
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ऐसी स्थिति में सऊदी का यह फैसला भारत के हित में है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक नरम रहती हैं, तो भविष्य में पेट्रोल, डीज़ल और LPG की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। वैसे भी, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने हाल ही में संकेत दिया था कि यदि कच्चे तेल की कीमतें युद्ध-पूर्व स्तर पर बनी रहती हैं, तो पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में कमी आ सकती है।
एक समाचार एजेंसी के अनुसार, विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका-ईरान युद्धविराम के बाद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ने की उम्मीद है। ऐसी स्थिति में सऊदी अरब एशियाई बाजार में, विशेष रूप से चीन और भारत में, अपना खोया हुआ बाजार हिस्सा वापस पाना चाहता है। इसी कारण उसने कीमतों में बड़ी कटौती की है।
अरामको के लिए सबसे महत्वपूर्ण बाजार चीन है, जो दुनिया का सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक है और यहीं सऊदी अरब की बाजार हिस्सेदारी घटी है। अनुमान है कि जुलाई में सऊदी अरब से चीन का आयात बढ़कर 7,05,000 बैरल प्रतिदिन हो गया।
यह जून के 12 वर्षों के सबसे निचले स्तर 6,26,300 बैरल प्रतिदिन से अधिक है, लेकिन ईरान युद्ध से पहले के तीन महीनों के औसत 14.8 लाख बैरल प्रतिदिन के आधे से भी कम है। अब कीमतें कम होने के बाद उम्मीद की जा रही है कि चीन की रिफाइनरियां फिर से सऊदी अरब से अधिक तेल खरीद सकती हैं।

जब कीमतों में तेज़ वृद्धि होती है, तब चीन के पास आयात घटाने का इतिहास रहा है, लेकिन जब कीमतें नरम पड़ती हैं, तो वह खरीद भी बढ़ा देता है। अगस्त के कार्गो के लिए अरामको द्वारा की गई कीमतों में कटौती इतनी बड़ी है कि चीन की सरकारी रिफाइनरियां फिर से अपनी पूरी आवंटित मात्रा की खरीद शुरू कर सकती हैं।
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि सऊदी अरब के लिए प्रतिस्पर्धा आसान नहीं होगी। संयुक्त अरब अमीरात (UAE), इराक और कुवैत जैसे देश अपने कच्चे तेल पर अधिक छूट दे रहे हैं। इसलिए एशियाई खरीदारों के पास कई सस्ते विकल्प उपलब्ध हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल पूरी दुनिया की नजर हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के खुले रहने पर टिकी हुई है। यदि इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में फिर से कोई तनाव या बाधा आती है, तो कच्चे तेल की कीमतें फिर तेजी से बढ़ सकती हैं। वहीं, यदि आपूर्ति सामान्य बनी रहती है, तो वैश्विक तेल बाजार में कीमतों को लेकर प्रतिस्पर्धा और अधिक तीव्र हो सकती है।

