भारतीयों के लिए सोने की चमक कोई कम नहीं कर सकता, PM मोदी भी नहीं

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PM मोदी ने मई और सितंबर में दो बार देश की जनता से कहा था कि एक साल तक सोना न खरीदें। पश्चिम एशिया की स्थिति के कारण विदेशी मुद्रा बचाने और गैर-जरूरी आयात कम करने के लिए यह अपील की गई थी। 10 मई और 1 सितंबर को यह बात कही गई थी। फिर भी लोगों ने इस पर खास ध्यान नहीं दिया। सोने का आयात और बिक्री दोनों बढ़ते ही रहे हैं। भारतीयों को सोना इतना पसंद है कि आर्थिक मुश्किलें भी उन्हें रोक नहीं सकतीं।

2025-26 में सोने का आयात रिकॉर्ड 71.98 अरब डॉलर हो गया था। यह देश के कुल आयात का लगभग 9-10 प्रतिशत हिस्सा है और कच्चे तेल के बाद दूसरी सबसे बड़ी वस्तु है। अप्रैल में आयात 81.69 प्रतिशत बढ़कर 5.63 अरब डॉलर हो गया था। अगस्त में यह 57.75 प्रतिशत घटकर 2.3 अरब डॉलर रह गया था। साल-दर-साल आयात बढ़ रहा है। 2022-23 में यह 35.02 अरब डॉलर था, 2023-24 में 45.54 अरब डॉलर (30 प्रतिशत वृद्धि), 2024-25 में 58.01 अरब डॉलर (27.4 प्रतिशत वृद्धि) और 2025-26 में 71.49 अरब डॉलर। उदय कोटक का कहना है कि 2026-27 में यह 88 से 90 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इतने बड़े आयात से व्यापार घाटा, चालू खाते का घाटा और विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ता है।

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उदय कोटक के मुताबिक अगर सोने को हटा दें तो 2025-26 में भारत का चालू खाता 25 अरब डॉलर के सरप्लस में था, क्योंकि सोने का आयात ही 72 अरब डॉलर का था। घरों में पड़ा सोना उत्पादक कामों में इस्तेमाल नहीं होता। कोटक कहते हैं कि “भारतीय और उनका सोना — यह एक बड़ी पहेली है जिसे सुलझाना है।”

ज्वेलरी कंपनियों ने मूल्य के हिसाब से अच्छी बिक्री की है, भले ही कीमतें बढ़ी हों। सितंबर में 24 कैरेट सोने की कीमत लगभग 1,54,210 रुपये प्रति 10 ग्राम हो गई थी, जबकि 2025 की शुरुआत में यह करीब 82,000 रुपये थी। विश्व बाजार में कीमतें बढ़ने, अनिश्चितता और रुपये के कमजोर होने से यह वृद्धि हुई है। लोग अब हल्के वजन के, कम कैरेट (16-22) और पत्थरों वाले गहने खरीदते हैं। क्रिसिल रेटिंग्स का कहना है कि ऊंची कीमतों के कारण ऐसा हो रहा है। डेलॉइट के सर्वेक्षण के मुताबिक ऊंची कीमतों से खरीदारी का तरीका बदलता है, लेकिन सोना छोड़ा नहीं जाता। लोग वजन कम करते हैं लेकिन शुद्धता बनाए रखते हैं।

टाइटन कंपनी (तनिष्क) ने 2026-27 की पहली तिमाही में 39 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की थी। त्योहारों और अक्षय तृतीया की मांग से यह वृद्धि हुई थी। जून 2026 तक 33 नए स्टोर जोड़कर कुल 1,227 स्टोर हो गए थे। कल्याण ज्वेलर्स ने अप्रैल-जून में लगभग 38 प्रतिशत सालाना वृद्धि दर्ज की थी। सेंको गोल्ड ने कुल आय में 67 प्रतिशत सालाना वृद्धि करके इसे 30.56 अरब रुपये तक पहुंचा दिया था।

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वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल का कहना है कि भारत ज्वेलरी खरीदने में सबसे आगे है। घरों में लगभग 31,000 टन सोना पड़ा है, जिसकी कीमत 314.9 ट्रिलियन रुपये है। अगर हर साल 1 प्रतिशत सोना बाहर निकाला जा सके तो 34 अरब डॉलर का आयात बच सकता है। गोल्ड ईटीएफ में भी बड़ी मात्रा में पैसा आया है। 2025-26 में 688.68 अरब रुपये निवेश किए गए थे और फंड का आकार काफी बढ़ गया है।

PM मोदी की अपील का मुख्य उद्देश्य आयात कम करना और विदेशी मुद्रा बचाना था। सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड योजना 2015 में शुरू हुई थी। इसका उद्देश्य घरों में पड़ा सोना बाहर निकालना और आयात कम करना था। आखिरी बॉन्ड फरवरी 2024 में आया था। उसके बाद कोई नया बॉन्ड नहीं आया है। योजना में खामियां थीं। सरकार ने सोने की कीमतें बढ़ने के जोखिम से बचाव नहीं किया था। पैसा सोना खरीदने में इस्तेमाल नहीं हुआ था। इससे सरकार पर बड़ा बोझ पड़ा। कीमतें 2,700 रुपये से बढ़कर 12,000 रुपये प्रति ग्राम से अधिक हो गई थीं। इस कारण 1.5 से 2.2 ट्रिलियन रुपये तक का भुगतान करना पड़ सकता है।

सोने की मांग ज्वेलरी, निवेश, शादी और त्योहारों से जुड़ी है। उदय कोटक का कहना है कि इस मुद्दे पर एक समिति बनाई जानी चाहिए। सोने के प्रति मोह का कोई आसान समाधान नहीं है। घरों में पड़ा सोना बाहर निकालने और आयात कम करने के लिए अच्छी नीतियां चाहिए। सांस्कृतिक जरूरत और सुरक्षा के साधन के रूप में सोने की जगह इतनी मजबूत है कि आर्थिक तर्क भी इसे हरा नहीं सकता। यह पहेली अभी तक सुलझी नहीं है।

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