- Hindi News
- राजनीति
- 'ब्रांड मोदी' को टक्कर देने के लिए राहुल गांधी की 'गुरिल्ला पॉलिटिक्स...'
'ब्रांड मोदी' को टक्कर देने के लिए राहुल गांधी की 'गुरिल्ला पॉलिटिक्स...'
कभी अचानक धरना, कभी पुलिस स्टेशन की तरफ कूच, कभी बिना किसी पूर्व सूचना के किसी जगह पर पहुंच जाना- राहुल गांधी की राजनीति में 'सरप्राइज' (सरप्राइज एक्शन) अब रणनीति का ही एक हिस्सा लगता है। मोदी सरकार को घेरने के लिए राहुल गांधी लगातार गुरिल्ला रणनीति का इस्तेमाल करते नजर आ रहे हैं।
कभी अचानक धरना देना, कभी पुलिस स्टेशन की ओर बढ़ना, तो कभी किसी को बताए बिना अचानक किसी ऐसी जगह पहुंच जाना, जहां बहुत बड़ी भीड़ भी न हो, ताकि किसी को शक न हो। कभी अकेले पहुंचना, तो कभी छोटी सी टीम के साथ। राहुल गांधी इस तरकीब का बार-बार इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि, यह भी सच है कि इस तरह की रणनीति उनके लिए पूरी तरह से नई नहीं है। इसकी झलक काफी समय पहले भट्टा-पारसौल में देखने को मिली थी, जब वे किसानों से मिलने के लिए बाइक से पश्चिमी उत्तर प्रदेश पहुंचे थे।
पुरानी तरकीब, अब ज्यादा धारदार
हालांकि पिछले कुछ वर्षों में उनकी रणनीति और अधिक तेज हुई है। राहुल गांधी पहले ही कह चुके हैं कि वे अपने विरोधियों को न्यूट्रल (बेअसर) करने के लिए उनकी कमजोरियों पर अधिक ध्यान देते हैं। उन्हें यह प्रेरणा अपनी मार्शल आर्ट की कुशलता से मिली है। राहुल गांधी मार्शल आर्ट की कई शैलियों का अभ्यास कर रहे हैं। 'भारत जोड़ो यात्रा' के दौरान भी वे पूरा दिन चलने के बाद शाम को भारत यात्रियों का मार्शल आर्ट्स ट्रेनिंग सेशन लेते थे।
धरना पॉलिटिक्स के लिए फिटनेस फॉर्मूला
दिलचस्प बात यह है कि विरोध की राजनीति के लिए भी जबरदस्त ऊर्जा की जरूरत होती है। राहुल गांधी ने खुद एक रील में कहा था कि अपने तमाम व्यस्त शेड्यूल के बावजूद वे शारीरिक तंदुरुस्ती (फिटनेस) को बहुत जरूरी मानते हैं और रोजाना लगभग एक घंटा एक्सरसाइज करते हैं।
हकीकत यह है कि राहुल गांधी यह बात पहले भी कहते आए हैं, लेकिन कुछ साल पहले उनके शब्दों का मतलब अलग था। आज उन्हीं बातों और तरीकों को ज्यादा ध्यान से देखा जाता है। खासकर तब, जब कांग्रेस ज़मीनी और धरना-प्रदर्शन की राजनीति में उनकी इस छवि का फायदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है।
'जिद्दी' रुख या सोच-समझकर बनाई गई रणनीति?
हाल के दिनों में राहुल गांधी अपनी आक्रामक रणनीति से सरकार को लगातार घेर रहे हैं। प्रधानमंत्री आवास की ओर जाते समय धरने पर बैठना हो या फिर संसद मार्ग पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज होने तक वहीं रहने की जिद हो, हर बार प्रयास संघर्ष के राजनीतिक संदेश को और धार देने का दिखता है। धरना पॉलिटिक्स में राहुल गांधी का यह जिद्दी रुख उनके हर राजनीतिक वार को और आक्रामक बना रहा है। राहुल गांधी के करीबी लोगों का मानना है कि वे सही-गलत के फैसले को राजनीतिक नफा-नुकसान के पैमाने पर नहीं तौलते। कई बार उन्होंने ऐसे फैसले लिए हैं जिनके परिणाम उन्हें भुगतने पड़े, लेकिन उनके साथ काम करने वाले लोग कहते हैं कि वे जो सोचते हैं, वही करते हैं।
ब्रांड मोदी के सामने ‘एंटी मोदी’ ब्रांड?
राहुल गांधी के सामने चुनौती बड़ी है। 'ब्रांड मोदी' की एक मजबूत और स्थापित राजनीतिक विरासत है। ऐसे में राहुल गांधी के व्यक्तित्व को मोदी से पूरी तरह विपरीत राजनीतिक ब्रांड के रूप में पेश करने की कोशिश दिख रही है। एक तरफ नियंत्रित और स्थापित सत्ता का ब्रांड है, तो दूसरी तरफ अचानक एक्शन की राजनीति है, सड़कों पर उतरना और टकराव की राजनीति। अब जनता को तय करना है कि आने वाली राजनीतिक लड़ाई में उसे कौन सा ब्रांड ज्यादा पसंद आता है।

