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जया एकादशी: इस व्रत को करने से सुख, शांति के अलावा पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है…
जया एकादशी का व्रत बहुत ही खास महत्व रखता है। हिंदू धर्म में इसका विशेष आध्यात्मिक महत्व है। देश और दुनिया के कई हिस्सों में भक्त पूरे भक्ति-भाव से जया एकादशी का व्रत रखते हैं। इस व्रत को करने से न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि पापों से भी मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसे कुछ क्षेत्रीय परंपराओं में भीष्म एकादशी भी कहते हैं। मान्यता है कि सूर्य के उत्तरायण होने के बाद पितामह भीष्म ने इसी दिन शरीर त्याग करने का मन बनाया था। माघ महीने की इस एकादशी का महत्व पद्म पुराण में बताया गया है। इसके अलावा श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर संवाद में के दौरान भी भगवान ने एकादशी का जिक्र किया था। स्कंद पुराण में भी जया एकादशी व्रत के नियम और व्रत करने का फल बताया है।
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को इस एकादशी की कथा और विधि सुनाई। उन्होंने इसे पापियों के पाप दूर करने वाली और मुक्ति देने वाली एकादशी बताया है। सबसे पहले श्रीकृष्ण ने ही इस एकादशी के बारे में बताया है। श्रीकृष्ण ने कहा कि जया एकादशी पुण्य देने वाली है। ये मनुष्यों के सभी पापों का नाश कर उसे पिशाच योनि से मुक्ति दिलाती है। उन्होंने कहा कि जो लोग पूरी श्रद्धा से जया एकादशी का व्रत करते हैं। उन्हें हजार सालों की तपस्या के समान फल मिलता है। जो इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, वो ब्रह्महत्या जैसे पापों से मुक्त होकर स्वर्ग के अधिकारी बनते हैं।
इस तरह पूरे विधि-विधान से करें एकादशी का व्रत
बता दें कि एकादशी व्रत एक दिन पहले से ही शुरू हो जाता है। दशमी तिथि पर सात्विक भोजन करना चाहिए। सूर्यास्त के बाद खाना न खाएं। एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर नहाएं और व्रत करने का संकल्प लें। इस दिन ‘निराहार' यानी बिना भोजन किए रहने का विधान है। सेहत ठीक न हो तो ‘फलाहार' किया जा सकता है, लेकिन अन्न यानी चावल, गेहूं और किसी भी तरह का अनाज नहीं खाया जाता। पूरे दिन भगवान का नाम जप और पूजा होती है। रात को जागरण करते हुए कीर्तन किया जाता है। अगले दिन यानी द्वादशी को ब्राह्मण भोजन करवाने के बाद ‘पारण' यानी व्रत खोला जाता है। बता दें कि जया एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित व्रत है। इस दिन उनकी पूजा-आराधना की जाती है।

