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मेघराजा के विराम से किसान परेशान, बोले- 10 घंटे बिजली के बावजूद कुएं में सिंचाई लायक पानी नहीं
पूरे गुजरात में मानसून के सीजन की शुरुआत में अच्छी बारिश होने की उम्मीद के साथ किसानों ने भारी जोखिम उठाकर अपने खेतों में बुवाई की थी। महंगे दाम के बीज, खाद और मजदूरी पर खर्च करके किसानों ने उत्साहपूर्वक सीजन की मानसूनी बुवाई शुरू की थी लेकिन, बारिश ने अचानक विराम ले लिया तो अब किसानों की जान सांसत में आ गई है। पानी के अभाव में चिंता ऐसी है कि, अगर बारिश नहीं आएगी तो, मूंगफली सहित की फसल मुरझा जाएगी। इतना ही नहीं, खेत उत्पादन का खर्च भी सिर पर पड़ने वाला है।
गुजरात में मानसून के आगमन को 63 दिन बीत चुके हैं। इसके बावजूद 17 जिलों में अभी भी 3 से लेकर 87 प्रतिशत बारिश की कमी देखी जा रही है। सबसे खराब स्थिति देवभूमि द्वारका, जामनगर, पोरबंदर और कच्छ की है। खेतों में खड़ी फसल मुरझाती और कुओं का पानी तलहटी तक जाता दिखाई दिया।
इस बारे में बात करते हुए किसान रो पड़े थे। किसान हेतल काकड़िया ने बताया कि, हमने 25 विघा में की गई मूंग की बुवाई विफल हो गई है। हमारा घरखर्च कैसे निकलेगा इसकी चिंता है। एक अन्य किसान ने कहा कि, ‘जो पैसे थे उससे बुवाई की। फसल सूख जाने पर हमें कोई उधार भी नहीं देता।’ भाविन गाजीपरा नाम के किसान ने बताया कि, सरकार ने 10 घंटे बिजली देने की शुरुआत की लेकिन कुएं में 4 घंटे चल सके इतना भी पानी नहीं है। किसानों को अपने साथ-साथ पशुओं के चारे की भी चिंता सताने लगी है।
उल्लेखनीय है कि, कृषि मंत्री जीतू वाघाणी ने बताया कि, किसानों को फसल बचाने के लिए पर्याप्त बिजली मिलती रहे इसके लिए अमरेली, पोरबंदर, जूनागढ़, देवभूमि द्वारका, गिर सोमनाथ, जामनगर और कच्छ जिले में 10 घंटे बिजली देने की शुरुआत की गई है। जरूरत के मुताबिक अन्य जिलों को भी यह लाभ दिया जाएगा।
बारिश की कमी के कारण खड़ी फसल सूख न जाए इसके लिए सौनी योजना और सुजलाम-सुफलाम योजना के तहत पानी देना जारी रखा है। माही कमांड क्षेत्र में पीने के पानी की जरूरत भी पूरी की जा रही है। इसके अलावा कड़ाणा बांध से पानी छोड़ने का निर्णय लिया गया है। राज्य में चारे की कमी होने की बात को सरकार द्वारा खारिज कर दिया गया है।
मानसून के बचे हुए दिनों में भी अगर बारिश नहीं हुई तो किसानों की आय पर आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी बुरा असर पड़ सकता है। मूंगफली सहित उत्पादन में कमी आए तो तेल सहित कीमतों में बढ़ोतरी भी हो सकती है।
सौराष्ट्र-कच्छ और उत्तर गुजरात के बांधों में अभी भी 50 प्रतिशत से कम जलसंग्रह है। अगर बारिश नहीं आती तो आने वाले दिनों में इन जिलों में पीने के पानी का सवाल विकट बनने की आशंका जताई जा रही है।
सौराष्ट्र, कच्छ और उत्तर गुजरात में मानसून कमजोर रहा हो ऐसा लगता है। मौसम विभाग के मुताबिक, चार-चार सिस्टम सक्रिय होने के बावजूद गुजरात में भारी बारिश के आसार नहीं हैं। गुजरात में सौराष्ट्र-कच्छ के क्षेत्र तथा स्थानीय स्तर पर सिंचाई के पानी की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण खेतों में लहलहाती खड़ी फसल अब पानी के बिना मुरझाने लगी है। समय पर बारिश नहीं मिलने के कारण धरतीपुत्रों को रोने की नौबत आ गई है। मेघराजा के विराम लेते ही मूंगफली, कपास, तिल, उड़द सहित तिलहन और दलहन को नुकसान होने जैसी स्थिति है।
किसानों के लिए बारिश का पानी अब मृगजल साबित हो रहा है। किसानों की आंखें अब आसमान की ओर ही टिकी हुई हैं कि, कब बारिश बरसे। राजकोट सहित द्वारका, पोरबंदर, कच्छ जिले में तो मूंगफली की फसल विफल हो गई है परिणामस्वरूप किसानों के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है। किसान अपने खेत में ट्रैक्टर चला रहे हैं। कई किसानों ने तो खेतों में भैंसें खुली छोड़ दी हैं ताकि खेतों में फसल का सफाया हो जाए।
उल्लेखनीय है कि, इस बार दक्षिण और मध्य गुजरात में अच्छी बारिश हुई है। जबकि नवसारी, सूरत, भरूच, डांग में तो भारी बारिश दर्ज की गई थी। राज्य के अधिकांश क्षेत्रों में लंबे समय से बारिश नहीं होने के कारण किसानों को अब यह चिंता सता रही है।
गुजरात में द्वारका, जामनगर, पोरबंदर और कच्छ की स्थिति चिंताजनक है क्योंकि, इन जिलों में बारिश की कमी देखी जा रही है। स्थानीय किसानों का कहना है कि, 2020-21 में मुख्यमंत्री किसान सहाय योजना में सूखे की परिभाषा तय की गई है कि, चार सप्ताह तक बारिश न आए तो, उस क्षेत्र को सूखाग्रस्त घोषित करें। इन चारों जिलों में 60 दिनों से बारिश ही नहीं हुई है। इसे देखते हुए सरकार को इन जिलों को सूखाग्रस्त घोषित करना चाहिए क्योंकि, इन क्षेत्रों में केवल 17 प्रतिशत तक ही बारिश हुई है। अधिकांश फसल सूख रही है। जगह-जगह किसान सिंचाई का पानी देने की भी मांग कर रहे हैं।
राज्य में सीजन की 75 प्रतिशत बारिश हो चुकी है। दक्षिण गुजरात के जिले जलमग्न हो गए लेकिन सौराष्ट्र के कुछ जिलों में अभी भी उल्लेखनीय बारिश का इंतजार है। देवभूमि द्वारका जिले में तो पूरे सीजन में केवल 2 इंच ही बारिश हुई है। यहां औसत की तुलना में 87 प्रतिशत बारिश की कमी देखी जा रही है।
मानसून की शुरुआत में अच्छी बारिश होने पर किसानों ने उत्साहपूर्वक बुवाई कर दी। लेकिन, अब जब मुरझाती फसल को पानी की तत्काल जरूरत है तब बारिश नहीं है और कुओं के तल दिखाई देने लगे हैं। देवभूमि द्वारका जिले के किसानों ने कहा- प्रति विघा किए गए 10 से 20 हजार रुपये का खर्च सिर पर पड़ गया है। किसानों को कुछ उपज होने वाली नहीं है अब कोई उधार माल भी नहीं देता। जूनागढ़ और जसदण के किसानों ने भी सरकार से मदद की मांग की है।
दक्षिण गुजरात और मध्य गुजरात सहित 16 जिलों में अब तक उल्लेखनीय बारिश हो जाने से यहां चिंता की स्थिति नहीं है। सौराष्ट्र में जहां 50 प्रतिशत से अधिक कमी देखी जा रही है। उसकी तुलना में दक्षिण गुजरात में जरूरत से 30 से 60 प्रतिशत अधिक बारिश हो चुकी है। गुजरात में इस सीजन में सबसे ज्यादा वलसाड में 108 इंच बारिश हुई। इसके मुकाबले देवभूमि द्वारका में 108 मिमी भी नहीं बरसा।
दक्षिण और मध्य गुजरात में उल्लेखनीय बारिश के कारण राज्य के महत्वपूर्ण बांधों में अब तक 73 प्रतिशत जलसंग्रह हो चुका है। नर्मदा भी 85 प्रतिशत भर गई है। अभी भी मानसून बाकी होने से जलसंग्रह में बढ़ोतरी की उम्मीद है। देवभूमि द्वारका में कम बारिश के कारण बांध भी तलहटी तक सूख गए हैं। जामनगर जिले के बांधों में भी केवल 6.85 प्रतिशत ही जलसंग्रह है। जब तक बारिश नहीं होती तब तक इन दोनों जिलों की 20 लाख से अधिक आबादी का आधार भूजल और नर्मदा पर ही रहने की स्थिति है।

