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                <title>धर्म ज्योतिष - Khabarchhe Hindi</title>
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                <description>धर्म ज्योतिष RSS Feed</description>
                
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                <title>'IIT बाबा' अभय सिंह ने इस रहस्यमय मंदिर में शादी क्यों की?</title>
                                    <description><![CDATA[<p>'देवभूमि' हिमाचल प्रदेश की गोद में स्थित अघंजर महादेव मंदिर इन दिनों चर्चा में है। इसका कारण यह है कि प्रयागराज महाकुंभ के दौरान चर्चा में आए 'IIT बाबा' अभय सिंह ने हाल ही में यहां इंजीनियर प्रतिका के साथ विवाह किया है। इस मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है। मान्यताओं के अनुसार, यह वही स्थान है जहां महाभारत काल में अर्जुन ने भगवान कृष्ण के मार्गदर्शन में भगवान भोलेनाथ की कठोर तपस्या की थी।</p>
<p>लोककथाओं के अनुसार, खनियारा गांव के इस पवित्र स्थल पर भगवान शिव ने अर्जुन की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे 'पशुपतास्त्र' प्रदान किया था, जिसने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://hindi.khabarchhe.com/religion-astrology/why-did-baba-abhay-singh-get-married-in-this-mysterious/article-2047"><img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/400/2026-04/iit-baba.jpg" alt=""></a><br /><p>'देवभूमि' हिमाचल प्रदेश की गोद में स्थित अघंजर महादेव मंदिर इन दिनों चर्चा में है। इसका कारण यह है कि प्रयागराज महाकुंभ के दौरान चर्चा में आए 'IIT बाबा' अभय सिंह ने हाल ही में यहां इंजीनियर प्रतिका के साथ विवाह किया है। इस मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है। मान्यताओं के अनुसार, यह वही स्थान है जहां महाभारत काल में अर्जुन ने भगवान कृष्ण के मार्गदर्शन में भगवान भोलेनाथ की कठोर तपस्या की थी।</p>
<p>लोककथाओं के अनुसार, खनियारा गांव के इस पवित्र स्थल पर भगवान शिव ने अर्जुन की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे 'पशुपतास्त्र' प्रदान किया था, जिसने महाभारत युद्ध में विजय का मार्ग प्रशस्त किया था। यह भी कहा जाता है कि भगवान शिव स्वयं कैलाश जाते समय इसी मार्ग का उपयोग करते थे।</p>
<img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/2026-04/temple.jpg" alt="temple" width="1280" height="720"></img>
tripadvisor.in

<p>अघंजर महादेव मंदिर की सबसे रहस्यमय और मनमोहक विशेषता यहां की 'अखंड धूना' है। बाबा गंगा भारती द्वारा स्थापित यह धूना पिछले 500 वर्षों से लगातार प्रज्वलित है। आश्चर्य की बात यह है कि इसे जलाते या बुझाते किसी ने नहीं देखा। बस समय-समय पर इसमें लकड़ियां डाल दी जाती हैं। मंदिर आने वाले भक्त बाबा गंगा भारती की समाधि और उनकी 500 वर्ष पुरानी गद्दी के दर्शन कर स्वयं को धन्य मानते हैं।</p>
<p>इस आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर स्थान के पास ही 'IIT बाबा' के नाम से प्रसिद्ध अभय सिंह ने अपने जीवन का एक नया अध्याय शुरू किया है। हरियाणा के झज्जर के निवासी और IIT बॉम्बे से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में स्नातक अभय सिंह ने स्पेशल मैरिज एक्ट के प्रावधानों के तहत कर्नाटक की इंजीनियर प्रतिका के साथ विवाह किया है।</p>
<img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/2026-04/iit-baba4.jpg" alt="IIT-Baba4" width="1280" height="720"></img>
economictimes.indiatimes.com

<p>प्रयागराज महाकुंभ में अपनी आध्यात्मिक साधना से पहचान बनाने वाले अभय सिंह ने बताया कि वे कांगड़ा के इस क्षेत्र की दिव्य ऊर्जा से इतने प्रभावित हैं कि वे अघंजर महादेव मंदिर के पास अपना आध्यात्मिक केंद्र (आश्रम) स्थापित करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए संसार के कल्याण के लिए अपने आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ते रहेंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म ज्योतिष</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 12:21:27 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>युद्ध का साया चारधाम यात्रा पर भी दिख रहा, श्रद्धालुओं में उत्साह कम, रजिस्ट्रेशन कम होने से पर्यटन करोबार पर पड़ेगा असर</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>देहरादून।</strong> ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध का असर अब चारधाम यात्रा पर भी दिखने लगा है। चारधाम यात्रा उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था के लिए रीढ़ मानी जाती है। इस यात्रा पर होटल इंडस्ट्री के अलावा पूरा पयर्टन उद्योग टिका हुआ है। चारधाम यात्रा अब दो हफ्ते का समय शेष बचा हुआ है। इसके बावजूद चारधाम यात्रा इस बार अनिश्चितताओं के साए में नजर आ रही है। यात्रा शुरू होने से पहले ही रजिस्ट्रेशन में आई गिरावट ने पर्यटन कारोबार को चिंता में डाल दिया है। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव और युद्ध जैसे हालात का असर अब इस</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://hindi.khabarchhe.com/religion-astrology/shadow-of-war-is-also-visible-on-chardham-yatra-less/article-2027"><img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/400/2026-04/110.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>देहरादून।</strong> ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध का असर अब चारधाम यात्रा पर भी दिखने लगा है। चारधाम यात्रा उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था के लिए रीढ़ मानी जाती है। इस यात्रा पर होटल इंडस्ट्री के अलावा पूरा पयर्टन उद्योग टिका हुआ है। चारधाम यात्रा अब दो हफ्ते का समय शेष बचा हुआ है। इसके बावजूद चारधाम यात्रा इस बार अनिश्चितताओं के साए में नजर आ रही है। यात्रा शुरू होने से पहले ही रजिस्ट्रेशन में आई गिरावट ने पर्यटन कारोबार को चिंता में डाल दिया है। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव और युद्ध जैसे हालात का असर अब इस धार्मिक यात्रा पर भी साफ दिखाई देने लगा है। 19 अप्रैल से शुरू होने वाली इस वर्ष की यात्रा के लिए पंजीकरण के आंकड़े पिछले साल की तुलना में कमजोर नजर आ रहे हैं। बीते वर्ष यात्रा के शुरुआती 26 दिनों में ही 17 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने रजिस्ट्रेशन कराया था, जबकि इस बार अब तक केवल 11 लाख श्रद्धालुओं ने ही पंजीकरण कराया है। यह गिरावट पर्यटन उद्योग से जुड़े लोगों के लिए खतरे की घंटी मानी जा रही है। माना जा रहा है कि वैश्विक तनाव की वजह से भक्तों में उत्साह कम है।</p>
<p><strong>एडवांस बुकिंग से पीछे हट रहे ट्रैवल ऑपरेटर्स</strong></p>
<p>इस बार ट्रैवल ऑपरेटर्स का रुख भी बदला हुआ नजर आ रहा है। आमतौर पर यात्रा शुरू होने से पहले एडवांस बुकिंग का सिलसिला तेज हो जाता है, लेकिन इस बार अधिकांश ऑपरेटर्स बुकिंग लेने से बच रहे हैं। उनका कहना है कि मौजूदा वैश्विक हालात को देखते हुए आर्थिक जोखिम काफी बढ़ गया है। पर्यटन व्यवसायी बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध जैसी स्थिति के चलते ईंधन की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी की आशंका बनी हुई है। यदि वे अभी के रेट पर बुकिंग लेते हैं और यात्रा शुरू होने तक डीजल-पेट्रोल महंगा हो जाता है, तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसी वजह से कई ऑपरेटर्स फिलहाल एडवांस बुकिंग से दूरी बना रहे हैं।</p>
<p><strong>होटल कारोबारियों में भी बढ़ती जा रही है चिंता</strong></p>
<p>चारधाम यात्रा का असर होटल व्यवसाय पर भी साफ देखने को मिल रहा है। होटल संचालकों का कहना है कि कपाट खुलने की तिथियों की घोषणा के बाद शुरुआत में बुकिंग में तेजी आई थी, लेकिन ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव की खबरों के बाद पहले से हुई बुकिंग पर भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। यही नहीं, अब तो नई बुकिंग भी लगभग बंद हो गई है।</p>
<img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/2026-04/28.jpg" alt="2" width="1280" height="720"></img>
shrineyatra.in

<p><strong>2025 में भारत-पाकिस्तान तनाव से प्रभावित हुआ था चारधाम यात्रा</strong></p>
<p>यह पहली बार नहीं है जब किसी तनावपूर्ण स्थिति का असर यात्रा पर पड़ा हो। वर्ष 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़े तनाव के कारण भी चारधाम यात्रा प्रभावित हुई थी। उस समय भी श्रद्धालुओं की संख्या में कमी आई थी और पर्यटन कारोबार को नुकसान झेलना पड़ा था।</p>
<p><strong>अर्थव्यवस्था के लिए बढ़ता खतरा</strong></p>
<p>इस बार स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय संघर्ष का सीधा असर ईंधन, परिवहन और यात्रा की कुल लागत पर पड़ सकता है। यही वजह है कि श्रद्धालु भी फिलहाल यात्रा की योजना बनाने में सतर्कता बरत रहे हैं। चारधाम यात्रा से जुड़े हजारों छोटे-बड़े व्यवसाय इस पर निर्भर हैं। ट्रांसपोर्ट, होटल, गेस्ट हाउस, टूर गाइड, घोड़ा-खच्चर संचालक और स्थानीय दुकानदारों की आजीविका इसी यात्रा से चलती है। ऐसे में रजिस्ट्रेशन में आई गिरावट इन सभी के लिए संभावित आर्थिक संकट का संकेत मानी जा रही है।</p>
<p><strong>फिलहाल आगे क्या है उम्मीद…</strong></p>
<p>फिलहाल ग्लोबल तनाव के बीच हालातों पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। यदि वैश्विक तनाव कम होता है और ईंधन की कीमतें स्थिर रहती हैं, तो आने वाले दिनों में यात्रा में सुधार की उम्मीद की जा सकती है। वहीं प्रशासन के सामने भी चुनौती है कि वह श्रद्धालुओं का विश्वास बनाए रखते हुए यात्रा को सुचारु रूप से संचालित करे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म ज्योतिष</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 14:00:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Hindi Khabarchhe]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चैत्र नवरात्रि का महानवमी: मां सिद्धिदात्री की वो कथा जिससे भगवान शिव बने 'अर्धनारीश्वर'</title>
                                    <description><![CDATA[<p>नवरात्रि के नौवें दिन को महानवमी कहा जाता है, मां दुर्गा के नौवें स्वरूप 'मां सिद्धिदात्री' की पूजा की जाती है। शास्त्रों के अनुसार, मां का यह स्वरूप सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाला है। इनकी उपासना से भक्तों के सभी कार्य सिद्ध होते हैं, दुखों का नाश होता है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा के साथ ही कन्या पूजन का भी विधान है।</p>
<p><strong>मां सिद्धिदात्री का स्वरूप</strong></p>
<p>मां सिद्धिदात्री कमल के पुष्प पर विराजमान हैं, हालांकि सिंह भी इनका वाहन है। माता की चार भुजाएं हैं, जो उनकी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://hindi.khabarchhe.com/religion-astrology/mahanavami-of-chaitra-navratri-the-story-of-maa-siddhidatri-by/article-1973"><img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/400/2026-03/maa4.jpg" alt=""></a><br /><p>नवरात्रि के नौवें दिन को महानवमी कहा जाता है, मां दुर्गा के नौवें स्वरूप 'मां सिद्धिदात्री' की पूजा की जाती है। शास्त्रों के अनुसार, मां का यह स्वरूप सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाला है। इनकी उपासना से भक्तों के सभी कार्य सिद्ध होते हैं, दुखों का नाश होता है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा के साथ ही कन्या पूजन का भी विधान है।</p>
<p><strong>मां सिद्धिदात्री का स्वरूप</strong></p>
<p>मां सिद्धिदात्री कमल के पुष्प पर विराजमान हैं, हालांकि सिंह भी इनका वाहन है। माता की चार भुजाएं हैं, जो उनकी असीम शक्ति का प्रतीक हैं। उनके दाहिने ओर के नीचे वाले हाथ में कमल का फूल और ऊपर वाले हाथ में शंख है। वहीं, बाईं ओर के नीचे वाले हाथ में गदा और ऊपर वाले हाथ में चक्र सुशोभित है। माता लाल रंग के वस्त्र धारण करती हैं, जो तेज और ऊर्जा का प्रतीक है।</p>
<p>पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब इस सृष्टि में केवल अंधकार था, तब मां कुष्माण्डा ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। ब्रह्मांड के निर्माण के बाद, भगवान शिव ने परम शक्ति की कठोर तपस्या की ताकि सृष्टि का संचालन सुचारू रूप से हो सके। </p>
<p>भगवान शिव की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने 'मां सिद्धिदात्री' के रूप में प्रकट होकर दर्शन दिए। माता ने शिव जी को आठ सिद्धियां (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व) प्रदान कीं। मां सिद्धिदात्री की कृपा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हो गया, जिसके कारण वे संसार में 'अर्धनारीश्वर' कहलाए। </p>
<p>एक अन्य कथा के अनुसार, जब सभी देवता महिषासुर के अत्याचारों से परेशान थे, तब मां सिद्धिदात्री ने ही अपनी शक्तियों से देवताओं को बल प्रदान किया और अंततः बुराई पर अच्छाई की जीत हुई। मां की महिमा ऐसी है कि ऋषि-मुनि, साधक ही नहीं बल्कि देवता और गंधर्व भी अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए इनकी शरण में रहते हैं।</p>
<p><strong>पूजा विधि और हवन</strong><br />महानवमी के दिन पूजा का विशेष फल मिलता है-</p>
<ul>
<li><strong>शुद्धिकरण: </strong>सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूरे मंदिर को गंगाजल छिड़क कर शुद्ध करें।</li>
<li><strong>हवन का महत्व:</strong> नवमी के दिन हवन करना अनिवार्य माना जाता है। हवन कुंड में आहुति देते समय मां दुर्गा के साथ-साथ सभी देवी</li>
<li>देवताओं का ध्यान करें। 'ॐ सिद्धिदात्र्यै नमः' मंत्र के साथ आहुति दें।</li>
<li><strong>भोग और पूजन:</strong> मां को फल, फूल, अक्षत और धूप-दीप अर्पित करें। अंत में मां की आरती उतारें।</li>
<li><strong>कन्या पूजन:</strong> पूजा के बाद 2 से 10 वर्ष की कन्याओं को घर बुलाकर उनके पैर धोएं। उन्हें सम्मानपूर्वक भोजन कराएं और उपहार देकर उनका आशीर्वाद लें। इसके बाद स्वयं प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण करें।</li>
</ul>
<p>मां सिद्धिदात्री को सात्विक भोजन अत्यंत प्रिय है। नवमी के दिन उन्हें **हलवा, पूरी, काले चने और नारियल** का भोग लगाया जाता है। कन्या पूजन में भी यही भोग वितरित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस भोग से माता तृप्त होकर घर में सुख-शांति का आशीर्वाद देती हैं।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म ज्योतिष</category>
                                    

                <link>https://hindi.khabarchhe.com/religion-astrology/mahanavami-of-chaitra-navratri-the-story-of-maa-siddhidatri-by/article-1973</link>
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                <pubDate>Fri, 27 Mar 2026 12:53:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Hindi Khabarchhe]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चैत्र नवरात्रि अष्टमी:  कैसे पार्वती बनीं मां महागौरी? जानें उनकी पौराणिक कथा और कन्या पूजन का महत्व</title>
                                    <description><![CDATA[<p>आज नवरात्रि का आठवां दिन है, जिसे 'महाअष्टमी' या 'दुर्गा अष्टमी' के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप, 'मां महागौरी' की उपासना के लिए समर्पित है। मां महागौरी को पवित्रता, शांति और सौम्यता की देवी कहा जाता है। मान्यता है कि इनकी पूजा करने से सभी भक्तों के पाप धुल जाते हैं और जीवन में सुख-शांति और खुशियां रहती है।  </p>
<p>शास्त्रों के अनुसार, मां महागौरी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के दौरान उन्होंने कई वर्षों तक केवल कंद-मूल और फल</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://hindi.khabarchhe.com/religion-astrology/-draft--add-your-title/article-1968"><img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/400/2026-03/maa3.jpg" alt=""></a><br /><p>आज नवरात्रि का आठवां दिन है, जिसे 'महाअष्टमी' या 'दुर्गा अष्टमी' के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप, 'मां महागौरी' की उपासना के लिए समर्पित है। मां महागौरी को पवित्रता, शांति और सौम्यता की देवी कहा जाता है। मान्यता है कि इनकी पूजा करने से सभी भक्तों के पाप धुल जाते हैं और जीवन में सुख-शांति और खुशियां रहती है।  </p>
<p>शास्त्रों के अनुसार, मां महागौरी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के दौरान उन्होंने कई वर्षों तक केवल कंद-मूल और फल खाए, और बाद में केवल वायु पीकर तप किया। धूप, वर्षा, धूल और ठंड सहते-सहते उनका शरीर काला पड़ गया था।</p>
<p>जब भगवान शिव उनकी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हुए, तो उन्होंने देवी को साक्षात दर्शन दिए। भगवान शिव ने जब अपनी जटाओं से निकली गंगा की पवित्र धाराओं से देवी के शरीर को साफ किया, तो उनका शरीर बिजली के समान अत्यंत सुंदर हो गया। उनके इसी गौर वर्ण के कारण उनका नाम 'महागौरी' पड़ा।</p>
<img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/2026-03/maa.1.jpg" alt="maa.1" width="1280" height="720"></img>
kisanindia.in

<p><strong>मां का स्वरूप</strong></p>
<p>मां महागौरी का वर्ण पूर्णतः श्वेत है, जिसकी उपमा शंख, चंद्रमा और कुंद के फूल से दी जाती है। इनके वस्त्र और आभूषण भी श्वेत रंग के हैं, इसलिए इन्हें 'श्वेताम्बरधरा' भी कहा जाता है। मां की चार भुजाएं हैं और वे वृषभ (बैल) की सवारी करती हैं। उनके एक हाथ में त्रिशूल है, दूसरे में डमरू, तीसरा हाथ अभय मुद्रा में और चौथा हाथ वर मुद्रा में रहता है।</p>
<p><strong>क्या है पूजन विधि </strong></p>
<p>अष्टमी के दिन मां महागौरी की पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर शुभ फल प्राप्त होते हैं:</p>
<ul>
<li>ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और सफेद रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें।</li>
<li>पूजा स्थान पर गंगाजल छिड़ककर शुद्धिकरण करें।</li>
<li>मां की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाएं और उन्हें सफेद फूल (विशेषकर मोगरा) अर्पित करें।</li>
<li>मां को सिंदूर, अक्षत और चंदन का तिलक लगाएं।</li>
<li>मां को नारियल या नारियल से बनी मिठाइयों का भोग लगाएं।</li>
<li>मंत्रों का जाप करें और अंत में मां की आरती उतारें।</li>
</ul>
<p><strong>कन्या पूजन का महत्व</strong><br />अष्टमी के दिन 'कन्या पूजन' का विशेष विधान है। इस दिन 2 से 10 वर्ष की कन्याओं को मां दुर्गा का स्वरूप मानकर उन्हें घर बुलाया जाता है। उनके पैर धोकर, उन्हें भोजन (हलवा, पूरी और काले चने) कराया जाता है। इसके बाद उन्हें उपहार और दक्षिणा देकर विदा किया जाता है। माना जाता है कि कन्या पूजन के बिना नवरात्रि की पूजा अधूरी रहती है।</p>
<p>मां महागौरी को 'नारियल' अत्यंत प्रिय है। इसलिए अष्टमी के दिन मां को नारियल का भोग लगाना शुभ माना जाता है। इसके अलावा, अष्टमी की विशेष थाली में सूजी का हलवा और काले चने का प्रसाद भी अर्पित किया जाता है।</p>
<p>पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप अत्यंत कल्याणकारी होता है:<br /><strong>'श्वेते वृषेसमारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥'</strong><br /><strong>'या देवी सर्वभू‍तेषु मां महागौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥'</strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म ज्योतिष</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 12:24:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Hindi Khabarchhe]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> चैत्र नवरात्रि का सातवां दिन: जानें रक्तबीज का संहार करने वाली मांं कालरात्रि की महिमा</title>
                                    <description><![CDATA[<p>  चैत्र नवरात्रि का सातवां दिन मां दुर्गा के सातवें स्वरूप 'मां कालरात्रि' को समर्पित है। काल का अर्थ है समय और रात्रि का अर्थ है रात, अर्थात जो काल का नाश करने वाली हैं, वही कालरात्रि हैं। इन्हें 'शुभंकरी' भी कहा जाता है क्योंकि ये अपने भक्तों का हमेशा शुभ करती हैं। विशेषकर तंत्र-मंत्र की साधना करने वालों के लिए मां कालरात्रि की पूजा का विशेष महत्व है।</p>
<p>दुर्गा मां का सातवां स्वरूप कालिका यानी काले रंग का है। मां कालरात्रि के विशाल केश हैं जो चारों दिशाओं में फैले हुए हैं। उनकी चार भुजाएं और तीन नेत्र हैं। मान्यता</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://hindi.khabarchhe.com/religion-astrology/69c3861c1ba05/article-1964"><img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/400/2026-03/maa2.jpg" alt=""></a><br /><p> चैत्र नवरात्रि का सातवां दिन मां दुर्गा के सातवें स्वरूप 'मां कालरात्रि' को समर्पित है। काल का अर्थ है समय और रात्रि का अर्थ है रात, अर्थात जो काल का नाश करने वाली हैं, वही कालरात्रि हैं। इन्हें 'शुभंकरी' भी कहा जाता है क्योंकि ये अपने भक्तों का हमेशा शुभ करती हैं। विशेषकर तंत्र-मंत्र की साधना करने वालों के लिए मां कालरात्रि की पूजा का विशेष महत्व है।</p>
<p>दुर्गा मां का सातवां स्वरूप कालिका यानी काले रंग का है। मां कालरात्रि के विशाल केश हैं जो चारों दिशाओं में फैले हुए हैं। उनकी चार भुजाएं और तीन नेत्र हैं। मान्यता है की देवी भगवान शिव के अर्ध्दनारीशवर रूप को दर्शाती हैं। माता की चार भुजाएं हैं जिनमें से खड्ग, कांटा और गले में माला मौजूद है। मां कालरात्रि के नेत्रों से अग्नि की वर्षा होती है। मां का एक हाथ ऊपर की ओर वर मुद्रा में है और दूसरा हाथ नीचे अभय मुद्रा में है। माता कालरात्रि के तीन नेत्र और सवारी गदर्भ है। देवी को शुभंकरी, महायोगीश्वरी और महायोगिनी के नाम से भी जाना जाता है।</p>
<p><strong>क्यों धारण किया मां ने यह रूप?</strong></p>
<p>पौराणिक कथाओं के अनुसार, शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज नाम के राक्षसों ने तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था। जब रक्तबीज युद्ध के मैदान में आया, तो उसे वरदान प्राप्त था कि उसके शरीर से खून की एक भी बूंद जमीन पर गिरेगी, तो उससे हूबहू उसके जैसा दूसरा राक्षस पैदा हो जाएगा। इससे देवताओं की चिंता बढ़ गई। </p>
<img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/2026-03/maa11.jpg" alt="maa1" width="1280" height="720"></img>
jansatta.com

<p>तब भगवान शिव के आग्रह पर देवी पार्वती ने अपनी शक्ति से मां कालरात्रि को उत्पन्न किया। जब मां कालरात्रि ने रक्तबीज पर प्रहार किया, तो उन्होंने उसका रक्त जमीन पर गिरने से पहले ही अपने मुख में भर लिया और उसके रक्त से बनने वाले असुरों का भक्षण कर लिया। इस प्रकार मां ने रक्तबीज का वध किया और देवताओं को भयमुक्त किया। मां का यह रूप दुष्टों के विनाश के लिए है, जबकि भक्तों के लिए वे ममतामयी हैं।</p>
<p><strong>मां कालरात्रि की पूजा विधि</strong></p>
<p>चैत्र नवरात्रि के सातवें दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल पर गंगाजल छिड़ककर शुद्धिकरण करें। </p>
<ul>
<li>एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर मां कालरात्रि की प्रतिमा स्थापित करें।</li>
<li>मां के सम्मुख घी का दीपक जलाएं।</li>
<li> उन्हें लाल रंग के फूल, विशेषकर 'गुड़हल के फूल', अक्षत और रोली अर्पित करें।</li>
<li>मां को प्रसन्न करने के लिए दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।</li>
<li>अंत में कपूर जलाकर माँ की आरती करें और पूरे परिवार के साथ जयकारे लगाएं।</li>
</ul>
<p><strong>भोग:</strong> मां कालरात्रि को 'गुड़' अत्यंत प्रिय है। सातवें दिन उन्हें गुड़ या गुड़ से बनी मालपुआ का भोग लगाना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से शोक और रोगों से मुक्ति मिलती है और आकस्मिक संकट दूर होते हैं।</p>
<p><strong>सिद्ध मंत्र:</strong> 'ॐ कालरात्र्यै नम:।'<br />'एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता, लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी'।<br />'वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभैषणा, वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी'॥</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म ज्योतिष</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 13:10:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Hindi Khabarchhe]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चैत्र नवरात्रि का छठा दिन: ऋषि कात्यायन की तपस्या से महिषासुर के अंत तक; पढ़ें मां कात्यायनी के जन्म और उनकी अद्भुत वीरता की कहानी</title>
                                    <description><![CDATA[<p>नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। मां कात्यायनी को साहस, वीरता और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाली देवी माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में 'कत' नाम के एक प्रसिद्ध महर्षि थे, उनके पुत्र ऋषि 'कात्य' हुए और उन्हीं के गोत्र में महान ऋषि 'कात्यायन' उत्पन्न हुए थे। ऋषि कात्यायन भगवती जगदम्बा के परम उपासक थे। उनकी कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने वर्षों तक कठिन तपस्या की। उनकी इच्छा थी कि साक्षात देवी दुर्गा उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें।</p>
<p>भगवती उनकी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुईं और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://hindi.khabarchhe.com/religion-astrology/sixth-day-of-chaitra-navratri-read-the-story-of-the/article-1960"><img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/400/2026-03/maan11.jpg" alt=""></a><br /><p>नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। मां कात्यायनी को साहस, वीरता और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाली देवी माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में 'कत' नाम के एक प्रसिद्ध महर्षि थे, उनके पुत्र ऋषि 'कात्य' हुए और उन्हीं के गोत्र में महान ऋषि 'कात्यायन' उत्पन्न हुए थे। ऋषि कात्यायन भगवती जगदम्बा के परम उपासक थे। उनकी कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने वर्षों तक कठिन तपस्या की। उनकी इच्छा थी कि साक्षात देवी दुर्गा उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें।</p>
<p>भगवती उनकी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने ऋषि कात्यायन की प्रार्थना स्वीकार कर ली। कुछ समय पश्चात, जब पृथ्वी पर महिषासुर नामक राक्षस का अत्याचार बहुत बढ़ गया, तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने-अपने तेज के अंश से एक देवी को उत्पन्न किया। चूंकि महर्षि कात्यायन ने सबसे पहले इस देवी की पूजा की थी, इसलिए इनका नाम 'कात्यायनी' पड़ा। यह भी माना जाता है कि इन्होंने महर्षि कात्यायन के आश्रम में ही पुत्री रूप में जन्म लिया था।</p>
<p>देवी कात्यायनी ने ही महिषासुर का वध किया था। भगवान कृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए ब्रज की गोपियों ने यमुना तट पर इन्हीं की पूजा की थी, इसलिए इन्हें सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए भी पूजा जाता है।</p>
<img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/2026-03/maan2.jpg" alt="maan" width="1280" height="720"></img>
aajtak.in

<p><strong>मां कात्यायनी का स्वरूप</strong><br />मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और ज्योतिर्मय है। उनका वर्ण सोने के समान सुनहरा और आभायुक्त है।</p>
<ul>
<li><strong>वाहन:</strong> मां कात्यायनी सिंह (शेर) पर सवार रहती हैं, जो उनके साहस और निर्भयता का प्रतीक है।</li>
<li><strong>भुजाएं:</strong> देवी की चार भुजाएं हैं। उनके दाहिनी ओर का ऊपर वाला हाथ 'अभय मुद्रा' में है और नीचे वाला हाथ 'वरद मुद्रा' में है, जो</li>
<li>भक्तों को सुरक्षा और वरदान प्रदान करता है।</li>
<li><strong>शस्त्र:</strong> उनके बाईं ओर के ऊपर वाले हाथ में 'चंद्रहास' नामक चमकीली तलवार है और नीचे वाले हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित है।</li>
</ul>
<p><strong>विशेषताएं और आध्यात्मिक महत्व</strong><br />साहस और आत्मविश्वास: मां कात्यायनी की पूजा करने से साधक के भीतर का भय समाप्त हो जाता है। यह देवी वीरता की प्रतीक हैं, जो व्यक्ति को आंतरिक और बाहरी शत्रुओं से लड़ने की शक्ति देती हैं।<br /><strong>विवाह बाधा निवारण: </strong>देवी कात्यायनी की आराधना उन कन्याओं के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है जिनके विवाह में विलंब हो रहा हो या कोई बाधा आ रही हो। 'कात्यायनी महामाये' मंत्र का जाप करने से सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।<br /><strong>मोक्ष और पुरुषार्थ:</strong> मां की भक्ति से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति सहज ही हो जाती है। भक्त इस लोक में सुख भोगते हुए अंत में परम पद को प्राप्त करता है।<br /><strong>आज्ञा चक्र का जागरण:</strong> योग साधना में लगे साधकों के लिए छठा दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इस दिन साधक का मन 'आज्ञा चक्र' में स्थित होता है। मां की कृपा से साधक को अलौकिक शक्तियों का अनुभव होने लगता है।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म ज्योतिष</category>
                                    

                <link>https://hindi.khabarchhe.com/religion-astrology/sixth-day-of-chaitra-navratri-read-the-story-of-the/article-1960</link>
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                <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 14:05:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Hindi Khabarchhe]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मां कुष्मांडा की दिव्य मुस्कान से हुई थी सृष्टि की रचना, जानें चौथे दिन की पौराणिक कथा</title>
                                    <description><![CDATA[<p>पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, यह उस समय की बात है जब सृष्टि का कोई अस्तित्व नहीं था। चारों ओर केवल घना अंधकार छाया हुआ था। न दिन था, न रात, न कोई लोक और न ही कोई जीव। हर तरफ केवल शून्यता व्याप्त थी। उस गहन अंधकार के बीच, अचानक एक दिव्य प्रकाश पुंज प्रकट हुआ। वह प्रकाश पुंज धीरे-धीरे एक स्त्री का स्वरूप लेने लगा, जो साक्षात शक्ति स्वरूपा मां कुष्मांडा थीं।</p>
<p><strong>सृष्टि की रचना और मां की मुस्कान</strong></p>
<p>मान्यता है कि मां कुष्मांडा ने अपनी मुस्कान से इस ब्रह्मांड रूपी को उत्पन्न किया था। 'कु' का अर्थ है</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://hindi.khabarchhe.com/religion-astrology/the-universe-was-created-by-the-divine-smile-of-mother/article-1945"><img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/400/2026-03/134.jpg" alt=""></a><br /><p>पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, यह उस समय की बात है जब सृष्टि का कोई अस्तित्व नहीं था। चारों ओर केवल घना अंधकार छाया हुआ था। न दिन था, न रात, न कोई लोक और न ही कोई जीव। हर तरफ केवल शून्यता व्याप्त थी। उस गहन अंधकार के बीच, अचानक एक दिव्य प्रकाश पुंज प्रकट हुआ। वह प्रकाश पुंज धीरे-धीरे एक स्त्री का स्वरूप लेने लगा, जो साक्षात शक्ति स्वरूपा मां कुष्मांडा थीं।</p>
<p><strong>सृष्टि की रचना और मां की मुस्कान</strong></p>
<p>मान्यता है कि मां कुष्मांडा ने अपनी मुस्कान से इस ब्रह्मांड रूपी को उत्पन्न किया था। 'कु' का अर्थ है छोटा, 'उष्मा' का अर्थ है ऊर्जा या ताप, और 'अंड' का अर्थ है ब्रह्मांड। देवी ने अपनी हंसी से ब्रह्मांड में व्याप्त अंधकार को नष्ट किया और सृष्टि की रचना की। इसीलिए उन्हें 'कुष्मांडा' कहा गया। उनके मुस्कुराते ही चारों ओर प्रकाश फैल गया और जड़-चेतन में प्राणों का संचार होने लगा।</p>
<p>मां कुष्मांडा के पास इतनी असीम शक्ति और तेज है कि वे सूर्य लोक के भीतर निवास करती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, केवल मां कुष्मांडा ही ऐसी देवी हैं, जो सूर्य मंडल के भीतर रहने की शक्ति और क्षमता रखती हैं। उनका तेज सूर्य के समान ही देदीप्यमान है। उनकी आभा से ही दसों दिशाएं आलोकित होती हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में जो तेज मौजूद है, वह मां कुष्मांडा की ही छाया है।</p>
<p><strong>त्रिदेवी की उत्पत्ति</strong></p>
<p>सृष्टि के संचालन के लिए मां कुष्मांडा ने तीन अन्य देवियों को उत्पन्न किया। उन्होंने अपने बाएं हाथ के अंगूठे से 'महाकाली', माथे के तेज से 'महालक्ष्मी' और दाएं हाथ के अंगूठे से 'महासरस्वती' को प्रकट किया। इसके पश्चात इन देवियों ने आगे चलकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा उनकी शक्तियों की रचना की। इस प्रकार मां कुष्मांडा को सृष्टि की 'आदि-शक्ति' माना जाता है।</p>
<p>मां कुष्मांडा की आठ भुजाएं हैं, इसलिए उन्हें 'अष्टभुजा देवी' भी कहा जाता है। उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृत कलश, चक्र, गदा और सभी सिद्धियों व निधियों को देने वाली जप माला है। वे सिंह (शेर) पर सवार हैं, जो शौर्य और साहस का प्रतीक है।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म ज्योतिष</category>
                                    

                <link>https://hindi.khabarchhe.com/religion-astrology/the-universe-was-created-by-the-divine-smile-of-mother/article-1945</link>
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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 13:19:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Hindi Khabarchhe]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नवरात्रि का तीसरा दिन : जानें मां चंद्रघंटा के दस हाथों और दिव्य स्वरूप का रहस्य</title>
                                    <description><![CDATA[<p>आज चैत्र नवरात्रि का तीसरा दिन है। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा का विशेष महत्व होता है। मां का यह स्वरूप वीरता, साहस और शांति का अद्भुत संगम है। उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, इसीलिए उन्हें 'चंद्रघंटा' कहा जाता है। उनकी यह कथा अधर्म पर धर्म की जीत और भक्तों की रक्षा के संकल्प को दर्शाती है।</p>
<p><strong>महिषासुर का आतंक और देवताओं का संकट</strong></p>
<p>पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में देवताओं और असुरों के बीच भीषण युद्ध छिड़ा हुआ था। उस समय असुरों का राजा महिषासुर था। महिषासुर अत्यंत शक्तिशाली और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://hindi.khabarchhe.com/religion-astrology/mythological-story-of-maa-chandraghanta-symbol-of-courage-and-victory/article-1941"><img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/400/2026-03/maa.jpg" alt=""></a><br /><p>आज चैत्र नवरात्रि का तीसरा दिन है। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा का विशेष महत्व होता है। मां का यह स्वरूप वीरता, साहस और शांति का अद्भुत संगम है। उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, इसीलिए उन्हें 'चंद्रघंटा' कहा जाता है। उनकी यह कथा अधर्म पर धर्म की जीत और भक्तों की रक्षा के संकल्प को दर्शाती है।</p>
<p><strong>महिषासुर का आतंक और देवताओं का संकट</strong></p>
<p>पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में देवताओं और असुरों के बीच भीषण युद्ध छिड़ा हुआ था। उस समय असुरों का राजा महिषासुर था। महिषासुर अत्यंत शक्तिशाली और अहंकारी था। उसने अपनी आसुरी शक्तियों के बल पर स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया और देवराज इंद्र को युद्ध में पराजित कर उनका सिंहासन छीन लिया।</p>
<p>महिषासुर ने न केवल स्वर्ग पर अधिकार किया, बल्कि उसने देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया। देवता दर-दर भटकने लगे और पृथ्वी पर साधारण मनुष्यों की भांति जीवन व्यतीत करने को मजबूर हो गए। असुरों के इस अत्याचार से चारों ओर हाहाकार मच गया।</p>
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<p><strong>त्रिदेवों का क्रोध और देवी मां का जन्म</strong></p>
<p>जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई, तब देवराज इंद्र के नेतृत्व में सभी देवता भगवान ब्रह्मा, विष्णु और शिव की शरण में पहुंचे। देवताओं ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि महिषासुर के आतंक के कारण वे स्वर्ग छोड़ चुके हैं और अब असुरों का अत्याचार सहना असंभव है।</p>
<p>देवताओं की दुर्दशा सुनकर त्रिदेव अत्यंत क्रोधित हो उठे। भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा के मुख से क्रोध के कारण एक दिव्य तेज प्रकट हुआ। उसी समय अन्य देवताओं के शरीर से भी तेज निकलकर उस पुंज में मिल गया। देखते ही देखते वह तेज एक विशाल पर्वत के समान दैदीप्यमान हो गया और उसकी दसों दिशाएं प्रकाशित हो उठीं। उस दिव्य प्रकाश पुंज के मध्य से साक्षात आदि शक्ति माँ दुर्गा का प्रकट हुईं।</p>
<p>मां के प्रकट होते ही देवताओं ने हर्षोल्लास के साथ उनका स्वागत किया और अपनी शक्तियां उन्हें भेंट स्वरूप दीं। भगवान शिव ने अपना 'त्रिशूल' भेंट किया, भगवान विष्णु ने अपना 'चक्र' दिया, देवराज इंद्र ने अपना 'वज्र' और ऐरावत हाथी से उतारकर एक 'घंटा' दिया। सूर्य देव ने अपना तेज और तलवार दी, तो प्रजापति ने मोतियों की माला अर्पित की।</p>
<p>मां चंद्रघंटा का स्वरूप अत्यंत भव्य है। उनका शरीर स्वर्ण के समान चमकता है। उनके दस हाथ हैं, जिनमें वे धनुष, बाण, ढाल, तलवार, गदा और त्रिशूल जैसे अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं। वे सिंह पर सवार हैं और उनके मस्तक पर स्थित अर्धचंद्र भक्तों को शांति और शत्रुओं को भय प्रदान करता है।</p>
<p><strong>महिषासुर के साथ भीषण युद्ध</strong></p>
<p>देवी ने अपनी दहाड़ और घंटे की भयानक ध्वनि से आकाश को गुंजायमान कर दिया। जब महिषासुर ने यह भयंकर गर्जना सुनी, तो उसने अपनी विशाल सेना को आक्रमण का आदेश दिया। मां चंद्रघंटा और महिषासुर की सेना के बीच महायुद्ध छिड़ गया। देवी के प्रचंड प्रहारों से महिषासुर के बड़े-बड़े सेनापति पल भर में ढेर हो गए। मां के हाथ में वह 'घंटा' था। जब मां ने उसे बजाया, तो उसकी तीव्र ध्वनि से महिषासुर की सेना के असुरों के कान फट गए और वे मूर्छित होकर गिरने लगे। अंत में मां चंद्रघंटा ने महिषासुर का वध कर देवताओं को उसके भय से मुक्त कर दिया।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म ज्योतिष</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Mar 2026 14:03:29 +0530</pubDate>
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                <title>नवरात्रि दूसरा दिन: जानें अटूट तपस्या की प्रतिमूर्ति मां ब्रह्मचारिणी की कथा और महत्व</title>
                                    <description><![CDATA[<p>नवरात्रि का पावन पर्व देशभर में हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। नौ दिनों तक चलने वाली यह पर्व के दूसरे दिन माँ दुर्गा के 'ब्रह्मचारिणी' स्वरूप की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी का यह रूप भक्तों और सिद्धों को फल देने वाला माना गया है। इनकी उपासना से मनुष्य के भीतर तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम जैसे गुणों की वृद्धि होती है।</p>
<p>शास्त्रों के अनुसार, 'ब्रह्म' का अर्थ है तपस्या और 'चारिणी' का अर्थ है आचरण करने वाली। इस प्रकार 'ब्रह्मचारिणी' का अर्थ हुआ, तप का आचरण करने वाली देवी। मां का यह रूप बहुत ही</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://hindi.khabarchhe.com/religion-astrology/know-the-second-day-of-navratri-the-story-and-importance/article-1934"><img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/400/2026-03/maan1.jpg" alt=""></a><br /><p>नवरात्रि का पावन पर्व देशभर में हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। नौ दिनों तक चलने वाली यह पर्व के दूसरे दिन माँ दुर्गा के 'ब्रह्मचारिणी' स्वरूप की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी का यह रूप भक्तों और सिद्धों को फल देने वाला माना गया है। इनकी उपासना से मनुष्य के भीतर तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम जैसे गुणों की वृद्धि होती है।</p>
<p>शास्त्रों के अनुसार, 'ब्रह्म' का अर्थ है तपस्या और 'चारिणी' का अर्थ है आचरण करने वाली। इस प्रकार 'ब्रह्मचारिणी' का अर्थ हुआ, तप का आचरण करने वाली देवी। मां का यह रूप बहुत ही सुंदर और मनमोहक है। उनके दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमण्डल सुशोभित है। वह सफेद वस्त्र धारण करती हैं, जो शांति और शुद्धता का प्रतीक है।</p>
<p><strong>पूर्वजन्म की कठोर तपस्या</strong></p>
<p>पौराणिक कथा के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी ने पूर्वजन्म में हिमालय राज के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था। भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए उन्होंने देवर्षि नारद के उपदेश पर अत्यंत कठिन तपस्या की। उनकी यह तपस्या हज़ारों वर्षों तक चली, जिसके कारण उन्हें 'तपश्चारिणी' या 'ब्रह्मचारिणी' के नाम जाना जाता है। </p>
<p>उनकी तपस्या की कठोरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक हजार वर्ष तक केवल फल और फूल खाकर समय व्यतीत किया। इसके बाद के सौ वर्षों तक उन्होंने केवल जमीन पर उगने वाली शाक-सब्जियों पर निर्वाह किया। इतना ही नहीं, मां ने खुले आकाश के नीचे भीषण गर्मी और कड़ाके की ठंड के साथ-साथ मूसलाधार वर्षा के कष्ट भी सहे।</p>
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<p><strong>कैसे पड़ा 'अपर्णा' नाम </strong></p>
<p>भगवान शिव की आराधना करते हुए उन्होंने तीन हजार वर्षों तक केवल जमीन पर गिरे हुए बेलपत्रों का सेवन किया। लेकिन अपनी अटूट श्रद्धा के चलते, बाद में उन्होंने उन सूखे पत्तों को खाना भी छोड़ दिया। हजारों वर्षों तक वह निर्जल रहकर तपस्या करती रहीं। पत्तों का त्याग कर देने के कारण ही उन्हें 'अपर्णा' के नाम से भी जाना जाता है।</p>
<p>कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया था। उनकी इस स्थिति को देखकर उनकी माता मेना अत्यंत दुखी हुईं। देवी की इस कठोर तपस्या को देखकर तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। देवता, ऋषि, मुनि सभी ने उनकी सराहना करते हुए कहा-"हे देवी! आज तक किसी ने ऐसी कठोर तपस्या नहीं की। यह केवल आप ही के बस की बात थी। आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी और भगवान शिव आपको पति रूप में प्राप्त होंगे।" अंततः ब्रह्मा जी ने उन्हें दर्शन दिए और तपस्या छोड़कर घर लौटने को कहा।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म ज्योतिष</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Mar 2026 13:31:02 +0530</pubDate>
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                <title>चैत्र नवरात्रि आज से, हिंदुओं का बदल जाएगा आज से कैलेंडर, जानिए नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा क्यों की जाती है?</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>सूरत। </strong>नवरात्रि की शुरुआत आज से यानी गुरुवार से हो गई है। हिंदू नववर्ष के साथ शुरू होने के कारण ये साल की पहली नवरात्रि होती है। वहीं, आज से हिंदुओं का कैलेंडर भी बदल जाएगा। विक्रम संवत 2083 की शुरुआत हो चुकी है। वहीं, नवरात्रि 19 से 27 मार्च तक रहेगी। पहले दिन घट स्थापना के लि</p>
<p>ए 8 मुहूर्त रहेंगे। इन दिनों देवी पूजा के साथ व्रत पर ज्यादा जोर दिया जाता है। इसकी मूल वजह है मौसम में बदलाव। इसलिए इस मौसम में खानपान पर ध्यान देने से पूरे साल बीमार नहीं होते हैं। देवी पुराण के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://hindi.khabarchhe.com/religion-astrology/%E0%A4%9A%E0%A5%88%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF-%E0%A4%86%E0%A4%9C-%E0%A4%B8%E0%A5%87--%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%93%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AC%E0%A4%A6%E0%A4%B2-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%97%E0%A4%BE-%E0%A4%86%E0%A4%9C-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B0--%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A5%8C-%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%AA%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%9C%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A5%88/article-1930"><img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/400/2026-03/102.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>सूरत। </strong>नवरात्रि की शुरुआत आज से यानी गुरुवार से हो गई है। हिंदू नववर्ष के साथ शुरू होने के कारण ये साल की पहली नवरात्रि होती है। वहीं, आज से हिंदुओं का कैलेंडर भी बदल जाएगा। विक्रम संवत 2083 की शुरुआत हो चुकी है। वहीं, नवरात्रि 19 से 27 मार्च तक रहेगी। पहले दिन घट स्थापना के लि</p>
<p>ए 8 मुहूर्त रहेंगे। इन दिनों देवी पूजा के साथ व्रत पर ज्यादा जोर दिया जाता है। इसकी मूल वजह है मौसम में बदलाव। इसलिए इस मौसम में खानपान पर ध्यान देने से पूरे साल बीमार नहीं होते हैं। देवी पुराण के अनुसार साल में दो नवरात्रि बहुत खास होती है। पहली मार्च-अप्रैल में होती है। इसे चैत्र नवरात्र कहते हैं। दूसरी सितंबर-अक्टूबर में आती है। इसे शारदीय नवरात्र कहते हैं।<br />अब जानते हैं कि नौ दिनों की पूजा विधि कैसे की जाती है<br />- हर दिन पूजा से पहले खुद पर गंगाजल छिड़कें, तिलक लगाएं और दीपक जलाएं।<br />- पहले गणेशजी फिर देवी पार्वती, कलश और उसके बाद देवी दुर्गा की पूजा करें। हर दिन देवी लक्ष्मी, सरस्वती और कालिका की पूजा करें।<br />- कुमकुम, चावल, हल्दी, फूल और इत्र सहित अन्य बताए चीजों से देवी पूजा करें। पूजा खत्म होने पर नैवेद्य लगाएं फिर आरती करने के बाद प्रसाद बांटें।</p>
<p><strong>नवरात्रि के 9 दिनों में किस दिन कौन-सी देवी की पूजा होती है और उनका महत्व, आइए अब ये भी जानते हैं</strong><br /><strong>पहला दिन- </strong>मां शैलपुत्री<br /><strong>महत्व:</strong> शक्ति और स्थिरता का प्रतीक<br />इस दिन कलश स्थापना की जाती है<br /><strong>दूसरा दिन-</strong> मां ब्रह्मचारिणी<br /><strong>महत्व:</strong> तपस्या, संयम और धैर्य<br />ज्ञान और शक्ति के लिए पूजा</p>
<p><strong>तीसरा दिन-</strong> मां चंद्रघंटा<br /><strong>महत्व:</strong> साहस और शांति<br />भय और नकारात्मकता दूर करती हैं<br /><strong>चौथा दिन-</strong> मां कूष्मांडा<br /><strong>महत्व: </strong>सृष्टि की रचयिता<br />ऊर्जा और स्वास्थ्य देती हैं<br /><strong>पांचवां दिन-</strong> मां स्कंदमाता<br /><strong>महत्व:</strong> मातृत्व और करुणा<br />सुख-शांति और समृद्धि<br /><strong>छठा दिन-</strong> मां कात्यायनी<br /><strong>महत्व:</strong> शक्ति और साहस<br />विवाह और रिश्तों के लिए शुभ<br /><strong>सातवां दिन-</strong> मां कालरात्रि<br /><strong>महत्व: </strong>बुराई का नाश<br />डर और बाधाओं को खत्म करती हैं<br /><strong>आठवां दिन-</strong> मां महागौरी<br /><strong>महत्व:</strong> शुद्धता और शांति<br />जीवन में सुख-समृद्धि लाती हैं<br /><strong>नौवां दिन-</strong> मां सिद्धिदात्री<br /><strong>महत्व:</strong> सिद्धि और सफलता देने वाली<br />सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं</p>
<p><strong>खास बात: </strong></p>
<ul>
<li>अष्टमी और नवमी बहुत महत्वपूर्ण होते हैं</li>
<li>इन दिनों कन्या पूजन किया जाता है</li>
</ul>
<p><strong>कलश स्थापना क्यों है इतना खास</strong></p>
<p>मिट्टी का कलश पृथ्वी तत्व का प्रतीक माना जाता है। इसमें जल और वायु तत्व होते हैं और पास रखा दीपक अग्नि तत्व का प्रतीक होता है। कलश में आकाश तत्व यानी ब्रह्मांड की सकारात्मक ऊर्जा का आह्वान करना ही घट स्थापना कहलाता है। जल से सृष्टि की उत्पत्ति मानी गई है और जल में सभी देवी-देवताओं का निवास माना जाता है, इसलिए कलश में शक्ति का आह्वान किया जाता है। इसके अलावा देवी भागवत के अनुसार नवरात्रि में हर दिन देवी दुर्गा के ही एक रूप की पूजा होती है। इस ग्रंथ में कहा है कि नवरात्रि में देवी को नौ रूपों में पूजना चाहिए। वहीं, मार्कंडेय पुराण में ब्रह्मा जी ने नौ दुर्गाओं के नाम और उनका महत्व बताया है। ये नवदुर्गा ही देवी के नौ रूप है। नवदुर्गा-पूजन एक पुरानी शास्त्रीय परंपरा है, जिसका जिक्र 8वीं सदी में मिले ग्रंथों में मिलता है।</p>
<p><strong>नवरात्रि व्रत से खानपान में संयम रखना सिखाता है</strong></p>
<p>नवरात्रि व्रत से खानपान की आदतों में संयम आता है। व्रत के दौरान कम भोजन मिलने पर शरीर अपनी कमजोर कोशिकाओं को तोड़कर ऊर्जा बनाता है। इससे अच्छी कोशिकाएं बची रहती हैं और शरीर स्वस्थ रहता है। यही नहीं, शरीर की क्षमता बढ़ती है और उम्र बढ़ने की संभावना भी ज्यादा होती है। खास बात यह है कि व्रत में केवल खानपान का ही नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म का भी संयम रखा जाता है। इससे शारीरिक और मानसिक, दोनों सेहत अच्छी रहती है। मानसिक व्रत में काम, क्रोध और लोभ जैसे विचारों का त्याग किया जाता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म ज्योतिष</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Mar 2026 16:17:44 +0530</pubDate>
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                <title>चैत्र नवरात्रि का प्रथम दिन: पढ़ें सती से शैलपुत्री बनने की पूरी कहानी</title>
                                    <description><![CDATA[<p>नवरात्रि के पावन पर्व के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। माँ दुर्गा के नौ रूपों में वे प्रथम हैं। 'शैल' का अर्थ होता है पर्वत और 'पुत्री' का अर्थ है बेटी। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण उन्हें 'शैलपुत्री' कहा जाता है।</p>
<p><strong>मां शैलपुत्री की पौराणिक कथा</strong></p>
<p>पौराणिक कथाओं के अनुसार, अपने पूर्व जन्म में मां शैलपुत्री राजा दक्ष की पुत्री थीं और उनका नाम सती था। सती का विवाह भगवान शिव के साथ हुआ था। एक बार राजा दक्ष ने एक 'महायज्ञ' का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने सभी देवी-देवताओं</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://hindi.khabarchhe.com/religion-astrology/read-the-complete-story-of-becoming-shailputri-from-sati-on/article-1928"><img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/400/2026-03/221.jpg" alt=""></a><br /><p>नवरात्रि के पावन पर्व के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। माँ दुर्गा के नौ रूपों में वे प्रथम हैं। 'शैल' का अर्थ होता है पर्वत और 'पुत्री' का अर्थ है बेटी। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण उन्हें 'शैलपुत्री' कहा जाता है।</p>
<p><strong>मां शैलपुत्री की पौराणिक कथा</strong></p>
<p>पौराणिक कथाओं के अनुसार, अपने पूर्व जन्म में मां शैलपुत्री राजा दक्ष की पुत्री थीं और उनका नाम सती था। सती का विवाह भगवान शिव के साथ हुआ था। एक बार राजा दक्ष ने एक 'महायज्ञ' का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन अपने अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंने भगवान शिव को निमंत्रण नहीं भेजा।</p>
<p>देवी सती बिना बुलाए ही अपने पिता के घर जाने की जिद करने लगीं। भगवान शिव के बहुत समझाने के बाद भी वे नहीं मानीं। जब वे यज्ञ में पहुंचीं, तो उन्होंने देखा कि वहां भगवान शिव का कोई स्थान नहीं था और उनका घोर अपमान किया जा रहा था। अपने पति का अपमान और पिता के कठोर शब्दों को सहन नहीं कर पाने के कारण, सती ने उसी यज्ञ की अग्नि में स्वयं को भस्म कर लिया।</p>
<p>सती के भस्म से भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए, और उन्होंने दक्ष का यज्ञ विध्वंस कर दिया। कालांतर में, यही सती अगले जन्म में पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और उनका नाम 'शैलपुत्री' पड़ा। इस जन्म में भी उन्होंने कठिन तपस्या करके भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया।</p>
<img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/2026-03/318.jpg" alt="3" width="1280" height="720"></img>
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<p><strong>मां शैलपुत्री का स्वरूप</strong></p>
<p>मां शैलपुत्री का स्वरूप अत्यंत शांत है। उनके दाहिने हाथ में 'त्रिशूल' है, जो शक्ति और दुष्टों के संहार का प्रतीक है, और उनके बाएं हाथ में 'कमल का फूल' है, जो शांति को दर्शाता है। वे बैल पर सवार हैं।  उनके माथे पर चंद्रमा सुशोभित है।</p>
<p><strong>मां शैलपुत्री का महत्व</strong></p>
<p><strong>स्थिरता और धैर्य का प्रतीक: </strong>पर्वत अडिग और स्थिर होते हैं। मां शैलपुत्री की पूजा करने से भक्त के जीवन में स्थिरता आती है। यह हमें सिखाती है कि बाधाएं चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, हमें अपने लक्ष्य के प्रति हिमालय की तरह अडिग रहना चाहिए।<br /><strong>मूलाधार चक्र का जागरण:</strong>  योग विज्ञान के अनुसार, नवरात्रि का पहला दिन 'मूलाधार चक्र' की साधना का होता है। मां शैलपुत्री को मूलाधार चक्र की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। इनकी उपासना से आध्यात्मिक शक्तियों का जागरण शुरू होता है।<br /><strong>प्रकृति का सम्मान:</strong> वे प्रकृति की देवी हैं। पर्वत और बैल के साथ उनका संबंध हमें पर्यावरण और जीव-जंतुओं के प्रति प्रेम और सम्मान का संदेश देता है।<br /><strong>सौभाग्य और स्वास्थ्य: </strong>माना जाता है कि मां शैलपुत्री की पूजा करने से चंद्रमा से जुड़े दोष दूर होते हैं और साधक को उत्तम स्वास्थ्य एवं सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म ज्योतिष</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Mar 2026 13:51:47 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>भारत में गैस की किल्लत, लेकिन शिर्डी में बिना परेशानी 40 हजार भक्तों के लिए हर रोज बन रहा है भोजन, आखिर कैसे?</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>शिर्डी।</strong> ईरान और अमेरिका-इजराइल जंग की वजह से ईंधन की आपूर्ति सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। इसका असर भारत में भी देखने को मिला है। लोग रसोई गैस की किल्लत से जूझ रहे हैं। गुजरात समेत कई राज्यों में सिलेंडर के लिए लंबी-लंबी लाइनें दिख रही है। कहीं-कहीं तो रात ही लोगों की लाइन लग जा रही है। सबसे ज्यादा परेशानी होटलों और रेस्टोरेंट चलाने वालों को हो रही है। कमर्शियल सिलेंडर नहीं मिल पाने की वजह से कई होटल और रेस्टोरेंट बंद हो चुके हैं। कई इंडक्शन पर शिफ्ट हो चुके हैं। अस्पतालों और कॉलेजों में चलने वाले कैंटीन</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://hindi.khabarchhe.com/religion-astrology/there-is-a-shortage-of-gas-in-india-but-food/article-1904"><img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/400/2026-03/216.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>शिर्डी।</strong> ईरान और अमेरिका-इजराइल जंग की वजह से ईंधन की आपूर्ति सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। इसका असर भारत में भी देखने को मिला है। लोग रसोई गैस की किल्लत से जूझ रहे हैं। गुजरात समेत कई राज्यों में सिलेंडर के लिए लंबी-लंबी लाइनें दिख रही है। कहीं-कहीं तो रात ही लोगों की लाइन लग जा रही है। सबसे ज्यादा परेशानी होटलों और रेस्टोरेंट चलाने वालों को हो रही है। कमर्शियल सिलेंडर नहीं मिल पाने की वजह से कई होटल और रेस्टोरेंट बंद हो चुके हैं। कई इंडक्शन पर शिफ्ट हो चुके हैं। अस्पतालों और कॉलेजों में चलने वाले कैंटीन भी मुश्किल में आ गए हैं। दरअसल, आपूर्ति का दबाव बढ़ने से रसोई गैस सिलेंडर समय से डिलीवर नहीं हो पा रहे हैं। </p>
<p>इस बीच शिर्डी स्थित श्री साईंबाबा संस्थान ट्रस्ट इन चिंताओं से बिल्कुल मुक्त हैं। यहां हजारों लोगों का भोजन हर दिन पकाया जाता है, इसके बावजूद यहां कोई दिक्कत नहीं है। दरअसल, यहां का सोलर कुकिंग सिस्टम एक मिसाल बन गया है। सौर ऊर्जा से चलने वाले इस सिस्टम से रोज हजारों श्रद्धालुओं के लिए भोजन पकाया जा रहा है। इस सोलर सिस्टम से हर दिन करीब 2,000 किलो खाना बनाया जाता है, जो लगभग 40 हजार श्रद्धालुओं के लिए पर्याप्त होता है। अब 40 हजार लोगों के लिए अगर गैस पर हर रोज खाना पकाया जाता है तो करीब 200 किलो गैस की खपत होती है। यानी हर रोज करीब 200 किलो गैस की बचत भी हो रही है। इस अनोखी पहल को देखते हुए मिनिस्ट्री ऑफ न्यू एंड रिन्यूएबल एनर्जी ने भी इस प्रोजेक्ट को देश के एक यूनिक मॉडल के रूप में सम्मानित किया है।</p>
<p><strong>रोज 75 से 80 हजार श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं</strong></p>
<p>बता दें कि शिर्डी में रोज औसतन 75 से 80 हजार श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। खास बात यह है कि साईं संस्थान के प्रसादालय में श्रद्धालुओं को मुफ्त भोजन दिया जाता है और लगभग 40 हजार लोग हर दिन इसका लाभ लेते हैं। पहले इतनी बड़ी मात्रा में खाना बनाने के लिए काफी ज्यादा गैस की जरूर पड़ती। ऐसे संकट के समय में संस्थान को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता। यही नहीं संस्थान पर काफी आर्थिक बोझ पड़ता। इसलिए जंग के बीच भी शिर्डी में भक्तों के लिए आज भी वैसे ही भोजन उपलब्ध करवाया जा रहा है।</p>
<img src="https://hindi.khabarchhe.com/media/2026-03/120.jpg" alt="1" width="1280" height="720"></img>
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<p><strong>2009 में सोलर कुकिंग सिस्टम शुरू हुआ</strong></p>
<p>हर रोज 40 हजार लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था करना इतना आसान नहीं होता। इसके लिए काफी खर्च भी आता है। इसके लिए बहुत ज्यादा गैस की भी जरूरत पड़ती है। ऊर्जा बचत और बढ़ते खर्च को देखते हुए संस्थान के ट्रस्टी मंडल ने जुलाई 2009 में सोलर कुकिंग सिस्टम लगाने का फैसला किया। इस प्रोजेक्ट पर करीब 1 करोड़ 37 लाख रुपए खर्च हुए। यह सिस्टम सिर्फ भक्तों के लिए ही नहीं बल्कि ट्रस्ट के लिए भी वरदान साबित हुआ।</p>
<p><strong>प्रसादालय परिसर में 73 सोलर डिश लगाई गई हैं</strong></p>
<p>बता दें कि प्रसादालय परिसर जहां भक्तों को भोजन कराया जाता है, वहीं सोलर सिस्टम लगाई गई है। इसमें 73 सोलर डिश लगाई गई हैं, जिनकी मदद से सोलर कुकर में भोजन तैयार किया जाता है। इस व्यवस्था से न सिर्फ ऊर्जा की बचत हो रही है, बल्कि पर्यावरण को भी फायदा मिल रहा है।</p>
<p><strong>श्रद्धालुओं के लिए गर्म पानी की सुविधा</strong></p>
<p>इसके अलावा साईं संस्थान ने सौर ऊर्जा से श्रद्धालुओं के लिए गर्म पानी की सुविधा भी शुरू की है। इससे नए श्रद्धालु निवास, द्वारावती और साईं आश्रम जैसी जगहों पर रोज 10 हजार से ज्यादा श्रद्धालुओं को 24 घंटे मुफ्त गर्म पानी मिल रहा है।</p>
<p><strong>15 क्विंटल चावल रोज पक रहा है</strong></p>
<p>इस प्रसादालय में 150 लीटर क्षमता के 10 बड़े कुकर लगाए गए हैं। इस सिस्टम के जरिए एक समय में 15 क्विंटल चावल, 5 क्विंटल दाल और 5 क्विंटल सब्जी पकाई जा सकती है। 2009 से 2026 तक की अवधि में इस प्रणाली के कारण दो लाख किलो से अधिक गैस की बचत हुई है। यही नहीं, संस्थान की दो करोड़ रुपये से ज्यादा की आर्थिक बचत हुई है।</p>
<p><strong>पर्यावरण संरक्षण में भी मिल रही है मदद</strong></p>
<p>इस सिस्टम के लगने से न केवल आर्थिक रूप से बचत हा रही है बल्कि शिर्डी की सामाजिक संरचना को मजबूत कर रही है। वहीं, पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। सोलर कुकिंग सिस्टम से ना केवल ईंधन की बचत हो रही है, बल्कि यह एक प्रेरणादायक मॉडल साबित हो रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म ज्योतिष</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 15 Mar 2026 15:23:56 +0530</pubDate>
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